गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

एक संस्मरण : खो गई, वो पहली सी वैदेही

राहुल कुमार
जैसे ही स्टेषन से बाहर निकला कि पूस माह की ठंडी हवा कमीज को भेदते हुए सीधे सीने में चुभने लगी। पहले ही झटके में समझ गया कि स्टेषन पर सुबह तक इंतजार करना सेहत के लिए ठीक न होगा। सो टैक्सी स्टैंड पर फोन लगाकर एक बुलेरो गाड़ी मंगवा ली। और उसमें बैठ कर सीधे अपने घर दिनारा की ओर चलना तय किया। मैं करीब चार महीने बाद घर वापस लौट रहा था। लेकिन किराये की बुलेरो से रात में जाने का यह पहला मौका था।
तकरीबन 25 मिनट के बाद ही दिनारा की दहलीज में हम दाखिल हो गए। बातों बातों में पता चला कि चालक दिनारा कस्बे का ही है। लेकिन मैं परिचित नहीं था। पिता जी का नाम बताते ही उसने चहक कर कहा था आप दिल्ली में रहते हो। गाड़ी कस्बे के पहले मकान को ही लांघी थी कि दसवीं कक्षा का वह रिष्ता याद आ गया जो आज भी गुदगुदाता है। और जिसकी खबरें मुझे टुकड़ों टुकड़ों में जवानी तक मिलती रही थीं। वैदेही का वह तीखा नाक नक्ष और सुंदर बादामी गोल बड़ी-बड़ी आंखों वाला चेहरा मेरे सामने घूमने लगा। वैदेही और मैं अंग्रेजी का ट्यूषन सक्सेना मास्साब के यहां पढ़ते थे। वैदेही अपनी सुंदरता के चलते जल्दी ही गली मोहल्ले और स्कूल के लड़कों की नजर में आ गई थी। और हर कोई उससे दोस्ती बढ़ाने और रिष्ता गांठने की फिराक में रहता था। वैदेही से मेरा रिष्ता दो तरह से था। एक तो हम दोनों के पिता एक ही स्कूल मंे षिक्षक थे। दूसरे, मैं जब भी ट्यूषन के लिए लेट हो जाता तो वह मेरा कागज नोट्स के लिए मास्साब के कागज और कार्बन पेपर के नीचे लगा देती थी। ट्यूषन खत्म होने के बाद मुझे पता चलता कि मेरा कागज भी मास्साब की नत्थी मंे था। इससे अधिक वैदेही से मेरा कोई रिष्ता कभी नहीं रहा। अपने संकोची स्वाभाव के चलते मैं न तो कभी उससे बात कर सका और न निगाह भर देख सका। बस सुनता था कि वह बला की खूबसूरत है। और इतनी सुंदर है कि पूरी तहसील में उसके मुकाबले लड़की नहीं।
वैदेही का झुकाव ही था कि मैं अन्य लड़कों की नजर में खास बन गया था। लड़के हरसंभव मेरी सोहबत करना चाहते। करीब आकर मुझे बहलाने और दोस्ती गांठने की कोषिष में रहते। मेरी आवाभगत करते। गर्मजोषी से स्वागत करते हुए हाथ मिलाते। इनमें दो लड़के जीतेंद्र और अनिल वैदेही की वजह से ही मेरे दोस्त बने थे। वह वैदेही की तरफ झुकाव रखते थे और मुझ पर लगाम लगाना चाहते थे। लेकिन मैं पहले ही अपने स्वाभाव के चलते इन सब मामलों मंे पड़ने वाला नहीं था।
जीतेेंद्र और अनिल की दांत काटी दोस्ती थी। ऐसी की एक दूसरे के बगैर कोई काम न करते। दोनों ने तय किया कि वैदेही की अन्य लड़कों से रक्षा करेंगे और उसे अपना बना कर रहेंगे। वैदेही के मन में क्या था मैं कभी नहीं जान सका। दोनों दोस्त बड़े चालक थे। पहला यानी अनिल वैदेही का दोस्त बन गया और दूसरा यानी जीतेंद्र उसका प्रेमी बन बैठा। दसवीं की परीक्षा नजदीक आ गई थी। मैं पढ़ाई में मषगूल हो गया। परीक्षा खत्म होते ही मुझे ग्वालियर भेज दिया गया। और बाकी पूरी पढ़ाई ग्वालियर में ही की। दिनारा आना जाना लगा रहा।
जब भी ग्वालियर से दिनारा आता तो जीतेंद्र और अनिल से मुलाकात हो जाती। और बातों बातों में अन्य लोगों से कभी कभार वैदेही, अनिल व जीतेंद्र के किस्से सुनने को मिलते रहते। इसी बीच सुना था कि अनिल को किसी ने वैदेही के घर के सामने 12 बार चाकू मारकर कत्ल कर दिया। जीतेंद्र ने जहर खाकर आत्महत्या करनी चाही। पहली बार बच गया। पर दूसरी बार में सफल हो गया। वैदेही की कोई सूचना नहीं थी। इसलिए मैं वैदेही का हाल जानने के लिए उतावला रहता। खुलकर किसी से पूछ भी नहीं सकता था। लेकिन आज जैसे ही गाड़ी गुप्ता जी के घर के सामने पहुंची। मैंने ड्राइवर से पूछा ही लिया, भाई ये बताओ कि गुप्ता जी के परिवार के क्या हाल चाल हैं। वह बुझी सी आवाज में बोला ठीक ही हैं। मैं चुप हो गया। फिर कुछ देर बाद हिम्मत करके पूछा, गुप्ता जी के एक बेटी थी न, उसके क्या हाल चाल है। कहीं शादी बादी हो गई या अभी भी पढ़ लिख रही है। अब चालक ने झटके से मेरे ओर देखा। और कड़क आवाज में बोला क्या बाबूजी लड़की थी या बबाल, खुद तो बर्बाद हो ही गई। तीन परिवारों को और ले डूबी। उसकी करनी ने ऐसा ताडंव मचाया कि दो लड़के तो मारे ही गए। खुद भी पागल हो गई। अब परिवार वाले उसके पागलपन का इलाज कराते फिर रहे हैं। कभी नेपाल भेजते हैं, कभी आगरा और कभी दिल्ली। सुनते हैं अभी दिल्ली में ही है।
चालक ने गाड़ी वैदेही के घर के सामने रोक दी। बोलना जारी रखा और जो घटा, कह सुनाया। कस्बाई जिंदगी का जो सच उसके मुंह से सुना, मैं स्तब्ध रह गया।
उसने बताया कि अनिल और जीतेंद्र दोनों वैदेही के इश्क में पड़ गए थे। इनमें से अनिल वैदेही दोस्त था। और जीतेंद्र वैदेही का प्रेमी। अनिल, वैदेही और जीतेंद्र के मिलने का स्थान व समय तय करता। वह दोनों की हरसंभव मदद करता। दोनों के बीच की अहम कड़ी बन गया। और दोनों के लिए बेहद खास। अनिल ने वैदेही के भाई से भी अच्छी दोस्ती गांठ ली थी। और घर पर आना जाना शुरू कर दिया था। जीतेंद्र के प्रेम पत्र भी वही लिखता और वैदेही तक पहुंचाने का काम भी उसी के जिम्मे था। वैदेही जीतेंद्र के साथ अनिल से भी पूरी तरह से खुली गई थी। दोनों घंटों बात करते रहते।
फिर न जाने क्या हुआ कि अनिल और जीतेंद्र में बिगड़ने लगी। शायद जीतेंद्र को अनिल का वैदेही के बेहद करीब होना चुभने लगा था। और वह अनिल पर शक भी करने लगा था। जीतेंद्र के अन्य दोस्त भी पीठ पीछे उसके कान भरने लगे थे। इस बात से वैदेही और अनिल दोनों बेखबर थे। फिर एक दिन अनिल और जीतेंद्र के बीच जमकर मारपीट हुई। जीतेंद्र का भाई इलाके का गुंडा था। फिर एक दिन अनिल को वैदेही के घर के सामने ही चाकू मारकर कत्ल कर दिया। जीतेंद्र के भाई ने उसे मारवा दिया था। और तभी से फरार चल रहा है। वैदेही इस बात से बेहद दुखी हुई और जीतेंद्र से दूरी बनाने लगी।
जीतंेद्र का शक और भी बढ़ गया। वैदेही से मिलने की जिद पर अड़ गया और एक दिन उसके घर पहंुच गया। दोनों के प्यार की बात घर वालों को पता चल गई। घरवालों ने वैदेही की जमकर पिटाई की। और शादी करा देना मुनासिब समझा। कुछ दिनों में ही उसकी शादी पक्की कर दी। वैदेही शादी नहीं करना चाहती थी। उसने जीतेंद्र को सब बता दिया। और कहा कि अब हम नहीं मिल सकते। जीतेंद्र को सदमा लगा। वह वैदेही को नहीं खोना चाहता था। और वैदेही से शादी करने की जिद करने लगा। वैदेही लोक लाज के डर से कोई बड़ा कदम नहीं उठा पा रही थी। अंत में जीतेंद्र ने जहर खाकर आत्महत्या करनी चाही। बच गया। लेकिन जब वैदेही को किसी भी सूरत में पाने की उम्मीद न रही तो फिर जहर खा लिया। और इस बार वह बच न सका। जीतेंद्र की मौत की खबर पाकर वैदेही एकदम टूट गई। और लगभग विक्षिप्त सी हो गई। कई महीनों उसने अन्न-जल छुआ तक नहीं। अपना प्यार खो जाने के बाद वह पत्थर की बुत बन कर रह गई। वह जीतेंद्र को नहीं भुला पाई। वैदेही की इस हालत में न तो शादी हो सकती है और न वह खुश रह सकती है। इसकारण घर वाले उसका इलाज कराते फिर रहे हैं।
कस्बाई जिंदगी की यह प्रेम कहानी सुनकर मेरा मन कचोट गया। आखिर तीन हंसती खेलती जिंदगियां स्वाहा हो गई। जीतेंद्र ने संकीर्ण दिमाग के चलते अपना दोस्त खो दिया। और वैदेही के परंपरावादी परिजनों ने जीतेंद्र से उसकी शादी न कर दोनों को जीते जी मार डाला। मैं ऐसे ही विचारों में खोया था कि अचानक वैदेही के घर के सामने एक चार पहिया गाड़ी आकर रूकी। गाड़ी से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति और एक जवान लड़का बाहर निकला। फिर दोनों ने गाड़ी का दरवाजा खोलकर एक लड़की को उसकी एक-एक बांह पकड़कर बाहर निकाला। तभी चालक ने ईशारा करते हुए कहा- यही है वैदेही। शायद दिल्ली से परिवार सहित वापस लौटी है। उसके पिता और भाई ने उसे पकड़ा है। और उसी गाड़ी से आए हैं जिससे आप आए हैं। मैं गौर से वैदेही की हालत देखने लगा। आज पहली बार वैदेही को निगाह भर के देखा है। लेकिन अफसोस वह पहली सी वैदेही नहीं रही। हंसती-खिलखिलाती और हमेशा पढ़ाई में अव्वल आने वाली वैदेही। जिसकी खातिर मैं जानबूझकर ट्यूशन पांच मिनट देरी से जाता था।

5 टिप्‍पणियां:

prerna ने कहा…

har baar kuch naya pad ke man khush ho jata hai rahul.. aur jab baat sachi ho aur gazab tarike se likhi ho to,kya kehne. hamesha acha aur badiya likhna. bohat sari shubhkamnayein

pooja ने कहा…

बेहतरीन याद है। खासकर इसलिए कि आपको याद है। कक्षा दसवीं का यह लम्हा, पूरी मस्लहत के साथ। घटनाओं को संजीदगी से बयां किया है। लेकिन यह महज कस्बाई जिंदगी की हकीकत नहीं। समाज का स्याह आईना है।

मधुकर राजपूत ने कहा…

मनोज पॉकेट बुक्स। कहानी ठीक है। लोच बहुत सारे। किस्सा इशक़ की रुसवाईयां यूं ही होती हैं।

Himanshu Sharma ने कहा…

aapki is yaad ko padkar meri bhi kuch yadain taja ho gayi. or laga ki kuch pal life me kabhi nhi bhulaye ja sakte hain.......

BIJAY MISHRA ने कहा…

लेख पढ़कर अच्छा लगा। हालांकि इस तरह के संस्मरण सभी के पास होते हैं। लेकिन उन्हें शब्दों की वर्णमाला में पिरोकर हूबहू चित्रित करना आसान नहीं होता। लेख में कहीं कहीं तारतम्यता का अभाव दिखा। लेकिन कथानक इतनी बेहतरीन है कि वह सभी खामियों पर भारी है। धन्यवाद, आशा है इसी तरह लेखन जारी रखेंगे।