शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

तलाश आवारगी की.....

जहां पहली सांस ली। उस गाँव के घरों में आज तक बिजली के मीटर नहीं लग सके हैं। बचपन की अटखेलियां जिन गली-कूचों में किशोर हुईं, वह जगह तहसील भी नहीं बन पाई है। एक क़स्बा है। लंबा सा। पहाड़ी की तलहटी में बसा। सुविधाओं के नाम पर एक 'थाना' था। जो आये दिन किसी न किसी की 'असुविधा' बनता था। एक 'प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र' था। फटी मटमैली चादर बिछे एकाध बिस्तर वाला। थानों में पीटे जाने वालों का झूठा मेडिकल प्रमाणपत्र यहां बनता था।

फिर जहां जवान हुआ, वो 'महानगर' है। कुछ कॉलेज हैं। कुछ कोचिंग हैं। पार्क हैं। रेस्तरां हैं। और हैं कुछ प्रेमिकाएं। कुछ मेहरबान दोस्त भी। कुछ जलने वाले हैं। कुछ नेह लुटाने वाले। प्रेमिकाएं अक्सर कॉफी हाउस में मिलने आती हैं। दोस्त कमरे पर आ धमकते हैं। यहाँ सड़कों पर गिचपिच है। सिपाही रोक लेता है तो गाड़ी के कागज माँगने से पहले पैसे मांगता है। जेबें टटोलता है। नेता है जो खींसें निपोरते हुए गाड़ियों में घूमता है।

एक पुराना किला है। शहर भर से ऊँचा। उदासी के क्षणों में घंटों मैं यहां से शहर देखता हूँ। वह सिपाही और नेता ऊँचाई से दिखाई नहीं देते।

फिर देश की राजधानी है। 'दिल्ली'। यहां मैं खुद को पहचानता हूँ। दूसरों को पहचानना सीखता हूँ। एक नामचीन अखबार में खबरें लाने की छोटी सी नोकरी करता हूँ, बड़े सपने लिए। हां यहाँ सताने को कोई नहीं। लोग टच भी हो जाते हैं तो बड़ी नजाकत से माफ़ी मांग लेते हैं। दिल्ली औपचारिक है। दिली नहीं। अपार्टमेंट में एक के ऊपर एक दो ढाई सदस्यों वाले परिवार रहते हैं। कहीं कहीं दबड़ेनुमा कमरों में दस-पंद्रह भरे हैं। यह रात को सिर्फ सोने आते हैं। यह सो भी पाते होंगे। ताज्जुब होता है। यहां शराब है। नाईट क्लब हैं। भीड़ है। गुमनामी है। चहल-कदमी है। तन्हाई है।

स्त्री चमड़ी बेचने वाले एबी रोड हैं। खरीदने वाले धन्ना सेठ से लेकर रिक्शे वाले हैं। सड़क पर खड़ी लड़कियां हैं और उनको एक रात के लिए ले जाने वाली कारें भी। यहां कुछ कमजोर चक्कर खाकर डीटीसी बसों में गिर जाते हैं। भागमभाग में खाना वक़्त पर नहीं खाते। या कमा नहीं पाते। प्राइम टाइम में वातानुकूलित मेट्रो भी पसीने-पसीने कर देती है। जबसे मेट्रो का पहला कोच 'केवल महिलाओं के लिए' हुआ है। कुछ शोहदे इससे सटे दूसरे कोच में ही खड़े होते हैं। कम से कम झाँक तो सकें।

कनॉट प्लेस' है। जहां फेसबुक पर दोस्त बनी लड़की से मैं डेटिंग करता हूँ। वह सकुचाई है। मैं घबराया। एक कॉफी और बर्गर के बाद हम विदा होते हैं। सुनता हूँ यहीं कुछ दूरी पर देश के राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री रहते हैं। क्या इस शहर के ट्रैफिक में वे भी फंसते होंगे। देर रात सड़कों पर निकलने से डरते होंगे। देख चुका हूँ 16 दिसंबर को एक लड़की को अपना नाम खोकर 'निर्भया' हो जाना पड़ा है। निश्चित ही उसका असली नाम इस नाम से खूबसूरत होगा।

आज जिस कॉलोनी में किराये से रहता हूँ,  यहां पड़ोस वाली आंटी एक दिन बिफर गईं। मेरे भाई की कार उनकी कार से टच भर हो गई थी। कहने लगीं  - फूहड़ बाहरी लोग। कॉलोनी में बस गए। इसे ख़राब करने के लिए। वह केंद्रीय विद्यालय में टीचर हैं। पर शायद नहीं जानतीं कि आर्य मध्य एशिया से भारत आए थे। और द्रविण न मैं हूँ और न वह। फिर बाहरी कौन ? मैं उन्हें समझाता नहीं डांट देता हूँ।

फिर सोचता हूँ कहाँ का हूँ मैं। गाँव, क़स्बा, महानगर, देश की राजधानी या इस कॉलोनी का। भारत का या मध्य एशिया का। क्या कोई नदी किसी गाँव, शहर, प्रदेश, देश की हो सकती है। जबकि उसकी शैली निरंतर बहना है। बस ऐसे ही मैं भी कहीं का नहीं होना चाहता। किसी एक स्थान में नहीं बंधना चाहता। जीवन एक आवारापन हो। अनंत। बेअंत। जिसका न शुरूआती बिंदु हो न आखिरी। ऐसा ही जीवन तलाश रहा हूँ मैं इस जीवन में।

2 टिप्‍पणियां:

Harekrishna Duboliya ने कहा…

पूरे चार साल बाद कोई पोस्ट यहां दिखाई दी है। पढ़कर दिल दिमाग में हिलोरे उठने लगी हैं।

राहुल यादव ने कहा…

हैरी क्या करूं... एक ऐसे टीले पर खुद को खड़ा पाता हूं जहां से दोनों तरफ एक सी ढलानें हैं। मैं किस पर सफर करूं तय अभी भी नहीं कर पाया हूं। आगे एक ही वाक्य सूझता है। जो होगा देखा जाएगा।