रविवार, 15 नवंबर 2009

बातों में उनकी हम न हो

राहुल कुमार
जिक्र उनका जब भी हो, बातों में उनकी हम न हो
ये तो ऐसे हो गया कि जिन्दगी हो गम न हो

याद जब भी हम करें और हिचकियां उनको न हो
ये तो ऐसे हो गया कि साज हो सरगम न हो

नाम मेरा लेती हो, और दांतों मंे अंगुली न हो
ये तो ऐसे हो गया साथी हो हमदम न हो

ख्याब मेरी आंखों में हो और तस्व्वुर उनका न हो
ये तो ऐसे हो गया कि जख्म हो मरहम न हो

जब भी हमसे रूठते हो, रात भर जगते न हो
ये तो ऐसे हो गया कि आंख हो पर नम हो

4 टिप्‍पणियां:

prerna ने कहा…

Shabdon ka bohat prabhavi tarike se upyog kia hai tumne. aasha hai ki aage bhi aisi rachna padne ko milegi...

pooja ने कहा…

इश्क इंसान को दर्शानिक बना देता है। राहुल तुमने बेहद खूबसूरत गजल लिखी है। अकसर जैसा तुम कहते हो व्यक्त करते हो। वही रूह तुम्हारी गजल में दिखाई दे रही है। उपमाएं लाजवाब हैं। आखिर वह तो ऐसे होते ही हैं कि हमारे हर लम्हे में शामिल होते हैं। काबिले तारीफ। किसी शायर ने कहा है कि - ऐसे तो कम ही होता है वो भी हो तन्हाई भी।

मधुकर राजपूत ने कहा…

दुनिया फानी है आनी जानी है।

rahul kumar ने कहा…

पूजा जी माना की गजल लिखने का दुस्साहस हम कर बैठे हैं। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि यह सब हम पर ही गुजरी हो। और वक्त दार्शनिक बना गया हो। लेखक अपने दोस्त और आसपास के लोगों का हाल-ए-दिल भी लिखता है। सो ये ख्याल छोड़ दो कि हम इश्क में निकम्मे हो चले हैं। अभी हमें करीब से और जानिये साहिबा। समझ आ जाएगा।