शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

और जुदा हो गया बगावती स्वर

राहुल कुमार
प्रभास जी से अपनी मुलाकात की बात सुनकर मैं बेहद उत्साहित था। इससे पहले उन्हें गोष्ठियांे में वक्तव्य देते सुना व देखा था। लेकिन एक कमरे में इत्मीनान से घंटे भर की बातचीत होगी, जितना चाहूंगा बतिया पाउंगा जैसा मौका हाथ लगने की सोचकर में लंबी लंबी डगें भर सड़क पर लगभग दौड़ सा रहा था। सन 2007, अगस्त माह की गर्मी थी। बरसात मुंह चिढ़ा रही थी। और दोपहरी के तीन बजे उनने मिलने का समय मिला था। प्रभास जी ग्वालियर के तनासेन होटल में ठहरे थे। मेरे गुरु आशीष द्विवेदी का जी फोन आया था और मेरी जनसत्ता में इंटर्न की बात भी करने बात भी कही थी।
मेरी सांस फूल रही थी, कुछ पैदल जल्दी जल्दी डगें बढ़ाने से तो कुछ पत्रकारिता के पितामह से मिलने की बात सुनकर। कैसे मिलूंगा ? क्या बात कंरूगा दिमाग मंे कई सवाल कौंद रहे थे। खैर में होटल में पहुंचा और जैसे ही उनके कमरे में दाखिल हुआ वह अपनी धोती बांध रहे थे। नईदुनिया के पत्रकार राजदेव पांडे, नरेंद्र कुईंया व गुरु आशीष द्विवेदी मौजूद थे। मैंने प्रभास जी के चरण स्पर्श किए और सामने बैठ गया। वह नईदुनिया के लिए साक्षात्कार दे रहे थेे। बात पत्रकारिता के कई आयामों पर हुई। प्रभास जी ने हर पहलू पर अपने विचार दिए। और अंत में मुस्कुराते हुए कहा कि छापना वही जो कह रहा हूं। आजकल कुछ कहो और पत्रकार कुछ छाप रहे हैं। अपने हिसाब से कुछ भी लिख रहे हैं। प्रभास जी का धोती पहनना जारी थी। लंबी सफेद धोती खुद धीरे धीरे बांध रहे थे। और पत्रकारिता के गुर सिखाते जा रहे थे।
प्रभास जी ने बताया कि कैसे उन्होंने हाथों पर लिख लिखकर रिपोर्टिंग की। राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते और राहुल सांस्कृत्यान के करीब रहकर क्या क्या खास सीखा। जनसत्ता का प्रयोग कैस सफल बनाया और पत्रकारिता में क्या कुछ बेहतर किया जा सकता है। वह कह रहे थे कि वह अब घूम-घूमकर यही पता लगाना चाहते हैं कि जो नई पीढ़ी पत्रकारिता में आ रही हैं कैसी है। उनमें कहा सुधार की गुंजाइश है और कहा वह पुरानी पीढ़ी से मजबूत है। वह कह रहे थे कि जगह जगह यात्राएं कर वह पत्रकारिता मंे आ रही बुराईंयों को दूर करना चाहते हंै। ताकी यह धर्म व सरोकारों की दुनिया सदा ऐसी ही बनी रहे।
उनका पूरा जोर पत्रकारिता के तेवर और लेखनी पर था। जो उन्होंने जनसत्ता में अपने नायाब प्रयोगों से करके भी दिखाई। और एक ऐसा इतिहास रच गए। जो हमेशा याद किया जाएगा।
वो दिन है कि आज का दिन है। प्रभास जी का हर कहा शब्द कानों में है। लेकिन उस दिन की तरह उनकी चमकती आंखे और होठों पर तैरती मुस्कान खो गई। आज सुबह जनसत्ता अपार्टमेंट पहुंचा तो वह शांत और निश्चिंत लेटे हैं। फूलों से सजे और सफेद चादर में लिपटे। एक युग आज एक ताबूत में बंद हो गया। प्रभास जी चले गए संसार छोड़कर। लेकिन वो सब कुछ दे गए जो हमें आगे की राह दिखाता रहेगा। बगावती तेवर, बुराई के खिलाफ डटकर खड़े रहने की हिम्मत, अंतिम सांस तक लड़ने की जिजीविषा, अडिग चट्टान सी विचारों की मजबूती और सत्ता के खिलाफ खड़े रहकर जनता को सत्ता मानने का स्वाभाविक गुण।

1 टिप्पणी:

munmun ने कहा…

आलोक तोमर जी ने लिका है कि है किसी में इतनी ताकत जो बने प्रभाष जोशी.....निसंदेह प्रभाष जी जैसा कोई नहीं और सत्य तो ये है कि अब किसी मै वो छमता भी नहीं दिखती खासकर वो लोग जो जो हालफिलहाल पत्रकारिता के दिग्गज बने बैठे, लेकिन हकीक़त सिर्फ यही नहीं वक़्त बीतते-बीतते बहुत से लोग आयेंगे प्रभाष जोशी बनने और फिर या तो इस धंधेबाज पत्रकारिता कि रौ में बह जायेंगे या गन्दी राजनीती में फंस कर लौट जायेंगे फिर से एक गुमनाम जीवन जीने के लिए सच तो यही है कि न जाने कितने आये और चले गए क्योंकि उनके पास किसी का हाथ और जेब में सिफारिशी चिठ्ठी नहीं थी, सर जी वो दौर कुछ और था ये दौर कुछ और, टैलेंट पड़ा-पड़ा सड़ गया हिंदुस्तान कि गलियों में क्योंकि उसे निकलने बाला कोई नहीं मिला, सड़कों कि धूल और खाक छानते-छानते न जाने कितनों के सपने हवा हो गए और आप पूछते हैं कौन बनेगा प्रभाष जोशी.... जरा कोई आगे आये और बताये कितने कितने प्रभाष उन्होंने गढे हैं, दूर-दूर से आँखों में बड़े-बड़े सपने सजा कर आने वाले कितने लोगों कि मदद उसने की है..... है किसी दिग्गज में इतनी ताकत........