शनिवार, 16 जनवरी 2010

आज भी है वो


राहुल कुमार

ये दिन क्यों जल्दी जल्दी ढलता है
शामें क्यों बोझल होती हैं
रात लंबी वीरानी लिए आती है
और सुबह नहीं सोने देती है
दिन की बैचेनी, रात की बेताबी मंे
अधूरा सा ख्वाब लिए, एक बेख्याली में
उसकी सूरत तैर आती है आंखों में
झूमती, गाती, इठलाती वो
नाजुक सी लड़की, मुस्कुराती वो
अकसर छेड़ जाती है पुरानी यादें
जब भी बैठता हूं अकेला
और ढूंढ़ता हूं खुद को
मन पर छाई वीरानी के कुहासे में
ढंूढ़ता हूं जब भी प्यार की बातें
पाता हूं बेहद करीब
आज भी उसकी सांसे,
जिसने दिखाए थे सपने
और तोड़े भी दिए
बनी थी हमसफर, किए थे वादे
उन पगडंडिंयों के जानिब मोड़ भी दिए
बेकसी और फासलों की गर्द के बीच
खोये उस अपनेपन के बीच
आज भी नजर आती है वो
देती खुद के होने का अहसास
और कहती है,
जुदा नहीं हूं मैं, जुदा नहीं हूं
मेरे भीतर आज भी है वो

3 टिप्‍पणियां:

pooja ने कहा…
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pooja ने कहा…

खूबसूरत, अच्छी कविता है।

मधुकर राजपूत ने कहा…

कभी मुझको साथ लेकर, कभी मेरे साथ चलके
वो बदल गया अचानक, मेरी ज़िंदगी बदल के
हुए जिसपे मेहरबां तुम, कोई खुशनसीब होगा
मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आंसुओं में ढलके
एक और अर्ज़ है कि....
तेरी जुदाई का मुझे, रंज़ नहीं हरगिज़
मेरे ख़्याल की दुनिया में, मेरे पास हो तुम