शनिवार, 4 दिसंबर 2010

ये जिंदगी है या है जंग

एक रंग तेरा खुदा, मैं तुझको बता दूं
तू आदमी बन जा और मैं तेरा खुदा हूं
भोग तू धरती के सारे अजूबे ढंग
और मैं ऊपर से तुझे, मनचाही सजा दूं

तुझको दौड़ाऊ बाइक से, एक्सप्रेस वे पर
और पीछे से तुझ पर, होंडा सिटी चढ़ा दूं
ले लूं नजारा बिलखते तेरे परिजनों का मैं
भविष्य के सपने सारे, ठहाके में उड़ा दूं

अचानक कर दूं तेरे, दिल में सुराख कोई
मांगता रहे तू भी उम्र भर हिसाब कोई
सोचे तू कि किस गलती की सजा है ये
मैं पटल कर दिखा दूं, नियमों की किताब कोई

देख तू धरती पर, आकर जरा करीब
बनाई हैं तूने, मजबूरियां इतनी अजीब
भूख, प्यास, गरीबी और दर दर ठोकरें
एक झटके में लिख डालूं, इन सब से तेरा नसीब

बतला दूं तुझे, तेरी दुनिया के सारे रंग
कर दूं तुझे, किन्हीं ऐसे लोगों के संग
पास होकर, तेरे होकर तुझको करें वो चोट
और तू सोचे कि ये जिंदगी है, या है जंग

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

लगता है खुदा के कामों से काफी नाराज़ हैं ...एक पिक्चर भी आई थी ...शायद देखी हो ...खुदा को अपना काम करने दीजिए ..वैसे अपनी व्यथा बहुत खूब लिखी है ...

pragati ने कहा…

khuda k likhe naseeb par rona badi baat nahi ,, vo thokare usi ki lakiro me gadta hai, jo sirf usike bande hote hai. aur jaha tak aapne kaha hai to kabhi sochna jab pareshania na hoti to kya aap ishwar ko mahsoos kar paate. asal ziindgi ka naayak to wo hi hai jo khuda ki raza me raaaj kare