गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

खबर का खौफ

राहुल कुमार
वह आठ साल की लड़की थी। पर उसने बात ऐसी कह दी कि मैं अचरज में पड़ गया और बहुत देर तक सोचता रहा। उसकी बात सुनकर लगा कि क्या ये बातें नामचीन संपादक, अखबार मालिक नहीं सोच पाते। आखिर उस लड़की के दिमाग में ऐसी बातें कैसे पनपीं, जो संपादकों के दिमाग में नहीं उपज पातीं।
बड़े दिनों बाद अखबारी काम काज से दो दिन की छुट्टी मिली। खुशी-खुशी मैं अपने गांव की ओर रवाना हो गया। रास्ते में ही बुआ का गांव पड़ता है। मध्य प्रदेश के दतिया शहर से करीब सात किलोमीटर दूर। लरायटा गांव। एक अरसा बीत गया था उन सबसे मिले। सो पहुंच गया। सबसे मिला। सब बैठ कर बतिया रहे थे कि अचानक छोटी बहन ने कहा भईया आप पत्रकार हैं! वही पत्रकार जो तीन खबर झूठी लिखते हैं और एक सच। जो पैसा मांगते फिरते हैं। मैं अंदर तक कांप गया। जिस गांव में रास्ता आज भी कच्चा हो, बिजली एक घंटे आती हो, स्कूल पांचवी तक हो और जहां अखबार जैसी चीज बामुश्किल ही पहुंचती हो, उस गांव की छोटी सी बच्ची के दिमाग में यह सच कैसे उपजा ? क्षेत्रीय स्तर पर पत्रकारिता की यह छवि किस तरह बन रही है। और उसकी सोच ऐसी क्यों बनी ? मैंने पूछा, तुमसे किसने कहा। उसने बताया, पड़ोस में पुलिस वाले रहते हंै उन्होंने। आगे बुआ ने कमान संभाल ली, कहने लगीं उनसे पत्रकार पैसे मांगते हैं। हर महीने 15-20 हजार रुपए। पुलिस से पत्रकारों का पैसा बंधा है। नहीं देने पर गलत खबरें छाप देते हैं। छोटे-छोटे अखबार ही नहीं, बड़े अखबारों का भी यही हाल है। मैं हिल गया। पैसा बंधे होने की बात से नहीं बल्कि आम लोगों में पत्रकारिता की गिरती छवि के बारे में सोचकर।
सोचता हूं, दिल्ली-एनसीआर की पत्रकारिता से इतर संपादक क्षेत्रीय स्तर पर कितना ध्यान देते हैं ? पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए कौन जिम्मेदार है ? नामचीन संपादकों और मालिकों को धंधा बनती पत्रकारिता दिखाई क्यों नहीं देती। प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी अखबारों ने क्षेत्रीय स्तर पर अपने संस्करण शुरू कर दिए हैं। लगातार बढ़ रहे हैं। व्यापक फैलाव की चाहत सभी को हो चली है। आगे बढ़ने की होड़ का आलम यह है कि अनचाही खबरें भी छापी जा रही हैं। पेज भरने की विवशता ने कई अनचाहे समाजसेवी और नेता पैदा कर दिए हैं। जिनका समाज से कोई सरोकार नहीं है और रोज अखबार में छपते हैं। फोटो के साथ कई काॅलम में। छपास के रोगी पैदा कर दिए हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे पर भी अनाप-शनाप बयान जारी कर देते हैं। कोई मुद्दा नहीं मिला तो क्रिकेट इंडिया जीती, नहीं जीती तो हाॅकी हारी आदि ऐसे कई मौकों को भुनाते हैं। कांग्रेस के राहुल गांधी के जन्मदिन पर मिठाइयां बंटीं, किसी भी बयान पर पुतला फंूक डाला और बड़े से फोटों के साथ छप गए। कभी-कभार पत्रकारों को छापने का मूल्य भी चुकाते हैं। कभी गिफ्ट के रूप में तो कभी सीधे पैसा देकर। प्रेस कांफ्रेस में रिपोटरों को दिए ट्रीटमेंट से तय होता है कि खबर कितनी बड़ी जाएगी। अच्छा खाना खिलाया तो डीसी बन गई। दारू पिला दी तो तीन से चार काॅलम और कुछ नहीं किया तो संक्षेप में सिमट जाती है।
आखिर पत्रकारिता के इस स्तर की जिम्मेदारी कौन लेगा। अखबार के मालिक, संपादक या रिपोर्टर। सवाल यह भी उठता है कि क्षेत्रीय पत्रकारों और संपादकों के बीच संवाद कितना है। कौन सा संपादक क्षेत्रीय स्तर पर जाकर पत्रकारों से सीधे मिलता है। उन्हें संस्थान से जुड़े होने का अहसास कराता है। पत्रकारिता की गुणवत्ता पर बात करता है। सिखाता है। उनके सुख दुख का साथी बनता है। और क्षेत्रीय संपादकों के इतर कितने अन्य कर्मचारियों के नाम उन्हें मुंह जबानी याद हैं। गुणवत्ता के गिरते स्तर पर कौन संपादक बात करता है। उनसे पूछता है, उनकी पेज भरने की विवशता। साथ ही एक दिन में पांच से आठ खबरें देने की विवशता के बाद उन्हें कितना वेतन देता है। कई संपादकों को तो यह भी नहीं पता होता कि क्षेत्रीय स्तर पर कितना पैसा दिया जा रहा है।हर छोटे शहरों की यही हालत है। बहुत से लोगों ने अधिकारियों, नेताओं को ब्लैकमेल करने के लिए ही अखबार निकालने शुरू कर दिए हैं। जमकर धंधेबाजी हो रही है।
पत्रकारिता के लिए बेहद अफ़सोस का दौर है। जब दूर-दराज के गांवों में पत्रकारिता की पहचान इस रूप में हो रही है तो शहरों के जागरूक पाठकों की नजर में क्या स्थिति होगी। और सबसे बड़ी बात उन रिपोर्टरों की क्या छवि होगी, जिनसे खबरों के दौरान वे मिलते हैं। यह दर्द संपादक और मालिक महसूस करते हांे, इसकी संभावना नहीं लगती। सारी संभावनाएं अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ाने की आपाधापी में गुम होती जा रही है। इस कड़वी सच्चाई से अखबार के मालिक, संपादक, रिपोर्टर भले ही नजरें चुराएं लेकिन एक आठ साल की बच्ची भी इसे बखूबी बयां कर देती है।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

खूब बिकी किशोरी वो तो नोएडा वाली आरूषि थी

राहुल कुमार
सिर्फ मरा हाथी ही सवा लाख का नहीं होता। यहां तो मासूम किशोरी आरूषि मरने के बाद मीडिया के लिए करोड़ों की साबित हुई है। धंधा बन चुकी और टीआरपी की गुलाम मीडिया ने जैसे चाहा आरूषि को वैसे बेचा। किसी ने पापा का पाप कहकर बेचा तो किसी ने पापा तूने क्यों मारा कहकर। किसी ने उसे मासूम करार दिया तो किसी ने आज की आधुनिक लड़की, जिसे माता पिता भी नहीं समझ सके। तरह तरह से। पचासों एंगल से उसे बेचा। बेवजह देश की सबसे बड़ी मिस्ट्री करार दिया। बेचने के कई तरीके खोजे। और जिस भाषा में, जिस दिमाग से बेचना चाहा, बेचा। इलेक्ट्राॅनिक ही नहीं प्रिंट ने भी बेचा। पूरा पूरा पेज बेचा। स्पेशल निकालकर। हर अखबार ने कम से कम तीन-तीन सौ बार आरूषि पर रिपोर्टें छापी। केस की हर हरकत पर अपने नजरिये से कुछ भी लिखा। मर्डर मिस्ट्री पर बांगडू से बांगडू रिपोटर्र की अपनी थ्योरी दी। जिसे वह अकाट सत्य मानकर जी रहा है। और दावा कर रहा है कि पुलिस या सीबीआई उस पर काम कर दे तो केस मिनटों मंे खुल जाए। छोटे से छोटा अखबार भी। बड़ी से बड़ी थ्योरियां दे रहा हैै। लगातार मर्जी से। क्योंकि आरूषि बिक रही है। और मीडिया ने उसे ऐसा बना दिया है। हाल ही के दिनों में आरूषि का जिन्न फिर जिन्दा हुआ है। पहले दिनों उसकी स्लाइट हैदराबाद में झूठी साबित हुई और अबकि उसका मोबाइल मिलने से हंडकंप मचा है। फिर सारी क्लिप बिकने लगी। फिर घंटो वाचक स्टूडियों मंे बकने लगे हैं। आरूषि आरूषि आरूषि। जिस रात मोबाइल मिलने की सूचना आई। कई चैनलों ने अपनी ओवी वैन खुर्जा भेज दी। रात भर मीडिया मैन धूमते रहे। प्रिंट को भी चैन नहीं। रातों रात लिख डाला। पिफर पुरानी पफाइलें काम आई। क्योंकि नया तो आरूषि फिर अखबारों के पहले पन्ने पर छपी और चैनलों पर घंटों दिखी।
सीबीआई ने छोड़ो तो मोबाइल वाली कुसुम को एक चैनल ने सुबह ही बिठा लिया। देखिए तमाशा सवाल पर सवाल। सवाल पांच मिनट में खत्म। वहीं सवाल फिर से। कुसुम उनका जवाब पांच पांच बार दे चुकी है। फिर से वही सवाल। आखिर समय खीचना है आरूषि बिक रही है और उसे बेचना है। कुसुम एक ही तरह सवालों को जवाब बार बार देे देकर खीझ रही है। लेकिन गरीब है। कुछ विरोध नहीं कर पा रही है। जो नहीं कहना चाहती चैनल उगलवाना चाहते हैं। कशमकस है।
अजीब है ये दुनिया। जहां सिर्फ छाने की हसरत लिए टीआरपी का बोलबाला है। गुलाम। जहां सोचने समझने की शक्ति का रास्ता सिर्फ विज्ञापन से होकर गुजराता है। जहां समाज और सरोेकार मर गए। मार दिए हैं। फिर भी दंभ है चैथे स्तंभ का। समाज को आईना दिखाने का। सोचता हूं अगर सच में आरूषि का भूत आकर उसे बेचने के तरीकों पर सवाल करे। या मानहानि का दावा करे तो मीडिया सलाखों के पीछे हो। बेचने की चाहत में कुसुम और रामभूले ने भी देश को, चैनलों के स्टूडियों के माध्यम से संबोधित कर डाला। आरूषि के प्रति आम लोगों में क्या है क्या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन मीडिया के लिए आरूषि इतिहास बन गई। मीडिया ने इतना बेचा की उसका हर रिपोर्टर और संस्थान का मालिक उसे हमेशा याद रखेेगा। और पंक्तियां दोहराएगा। खूब बिकी किशोरी वह तो नोएडा वाली आरूषि थी। अफसोस हर्ष के साथ।

सोमवार, 1 जून 2009

अगर नोट 1 हजार का होता तो.....

राहुल कुमार
अंदर तक हिला देने वाली और बहुत से मिथक तोड़ देने वाली इस घटना में शामिल होने का जितना मुझे दुख हैै उससे कहीं अधिक रोष। घटना के बाद में देर तक यही सोचता रहा कि अगर नोट 1 हजार को होता तो क्या ऐसे हालात बनते ? पत्रकार प्रेस कांफ्रंेस का बहिष्कार करके जाते या फिर चुपचाप अंटी में लिफाफा दबाकर लंच कर चल देते। पर इस वाकया से एक बात जरूर साफ हो गई कि पत्रकारिता की औकात नेताओं के नजर में क्या रह गई है। वह भी ऐसे टूच्चे नेताओं की नजर में जो एक जिले या प्रदेश की राजनीत करते हैं।
हुआ यूं कि 1 जून को उप्र महिला कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव जाहिरा जैदी ने नोएडा में प्रेस वार्ता की। प्रेस वार्ता का सारा जिम्मा कांग्रेस से लोकसभा के प्रत्याशी रहे रमेश चंद्र तोमर व अन्य कथित नेताआंे पर था। वार्ता में बड़ी बड़ी बातें कहकर, खुद को देशभक्त बताकर जैदी ने प्रेस रिलीज को लिफाफे में रखकर बांटना शुरू कर दिया। पत्रकारों ने जैसे ही लिफाफा खोला उसमें सौ का नोट भी निकला। जो निश्चित रूप से पत्रकारों को रिश्वत के तौर पर था। ताकी वार्ता का कवरेज बेहतर हो। लेकिन पत्रकारों ने सौ का नोट देखकर आपा खो दिया और वार्ता का बहिष्कार कर दिया। नेताओं के होश उड़ गए। मांफी मांगते फिरे और खूब मिन्नतें कीं। लेकिन कुछ पत्रकार मान गए कुछ चल दिए।
सोचता हूं कि आखिर इन कथित नेताओं के मन में पत्रकारों की औकात क्या रह गई है ? बताया गया कि किन्हीं दलाल पत्रकारों ने उनके शुभ चिंतक होेने और अच्छा कवरेज कराने की बात कहकर उन्हें यह सलाह दी थी कि लिफाफे में 100 रुपए रख कर दे देना। नेता अखबारों और चैनल के कार्यालय में फोन करते रहे और खुद पत्रकारों की सलाह पर ऐसा कृत्य करने की बात कहते रहे।
इस घटना के बाद से मैं बड़ा आहत हूं। पत्रकारिता को लेकर जो मिथक और सपने मैंने गढ़े थे उन्हें बड़ा धक्का लगा है। खासकर धक्का उस समय घाव बन गया जब नेताओं के खिलाफ खबर न छाप कर सीधे और सही रूप मंे लिखने की बात सामने आई। मैं सोच रहा था कि खबर मुख्य पृष्ठ पर जाएगी और जाहिरा जैदी की पत्रकारिता का अपमान करने की बात पर महासचिव के पद से छुट्टी हो जाएगी। अपने हाल ही में शुरू हुए पत्रकारिता जीवन में इसतरह का यह पहला मौका था। गंदी हो चुकी राजनीति का यह कार्य सहनशीलता से बाहर है। लेकिन पत्रकारों की यह औकात आखिर बनाई किसने है ? इतना बड़ा अपमान वहां मौजूद कुछ अखबारों के संपादक और बड़े रिपोर्टर हंसते हंसते सह गए। हां मेरी उम्र के कुछ नए पत्रकारों और फोटोग्राफर ने विरोध किया और नेताओं के बुलाने का पुरजोर आग्रह करने के बावजूद वापस नहीं गए।
पत्रकारिता का इसतरह से पतन देखकर मन अंदर से बहुत भारी हो गया। और लगा जैसे पत्रकारिता की धार पैसों ने कुंद कर दी। पिछले एक साल से नोएडा की पत्रकारिता की छवि देखकर अब महसूस करता हंू कि अगर नोट 1 हजार का होता तो क्या जो पत्रकार वापस आ गए या जो विरोध हुआ वह भी होता क्या ? चुनाव का मौका हो या फिर छोटा मोटा लाभ लेने की स्थिति खबरों से हमेशा ही तो समझौता होता है। लोकसभा चुनाव में पत्रकारों की हैसियत भी तो इसी बात से नापी गई थी कि किसने कितना पैसा पार्टियों से कमा पाया। जिनसे ज्यादा पाया वह ज्यादा बड़ा पत्रकार।
अफसोस बड़े पत्रकारों की सौदेबाजी में हम जैसे रिपोर्टर की इज्जत हर कदम पर जार जार होती है। टूच्चे नेताओं में 100 रुपए देने का साहस तभी आया जब बड़े पत्रकार बड़े नेताओं से करोड़ों का सौदा करते हैं। अकसर पत्रकारिता को वैश्या कहे जाने का रिवाज खुर्शियों में आता रहा है लेकिन कुछ दलालों ने इसे वैश्या से भी गया गुजरा बनाकर छिनाल का रूप दे दिया है। क्योंकि वैश्या तो मजबूरी में पेट पालने के लिए जिस्म का सौदा करती है। पर छिनाल अपने आनंद के लिए कई लोगों के साथ हमबिस्तर होने में सुकून पाती है। ऐसी ही हालत पत्रकारिता की होती जा रही है। जो अलग अलग लोगों के फायदे के लिए धनाढ्यों की रखैल बनकर रह गई है। पैसा दो कुछ भी छपवा लो, रात को पत्रकारों को दारू पिलाओ और कुछ भी छपवा लो।
लेकिन पत्रकारिता का यह रूप कितने समय तक उसे जीवित रख सकता है। यह वाकया जरूर एक जिले का हो लेकिन यह हालत बड़े स्तर पर और भी भयावह है। पत्रकारिता के मायने खो गए हैं। एसी और लग्जरी गाड़ियों में सफर करने वाले संपादक अभी भी सावधान नहीं हैं। राज्यसभा में जाने का सपना संजोये बैठे यह संपादक आखिर इस सौ रुपए की जलालत को नहीं झेल रहे हैं। वह इस बात में फूले नहीं समाते कि अमुख नेता से उनके अच्छे संबंध हैं। मेरा नेताओं को दोष देने का मन कतई नहीं हो रहा है। क्योंकि बिकाउ तो हमारी ही बिरादरी हो गई है। और जो चीज बिकाउ हो उसे कौन नहीं खरीदना चाहता है। पैसा है तो खरीद रहे हैं। लेकिन दुख इस बात है कि बाहर से बेहतर छवि परोसने वाली पत्रकारिता किस स्तर तक गिर गई है। और ऐसे ही हालात रहे तो और किस स्तर तक गिरेगी....?

मंगलवार, 19 मई 2009

काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती

राहुल कुमार
वाकई बहुत बेशरम हैं। लानत है इन नेताओं पर जो जनता के धिक्कारने के बाद भी अपनी खुदगर्जी से बाज नहीं आ रहे हैं। मुंह की खाने के बाद भी बांगडू बांग दे रहे हैं। समर्थन ले लो समर्थन। अरे भाई काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। जनता बेवकूफ नहीं है। समझ गई हरामखोरी को। निकाल फेंका न मक्खी के तरह राजनीति से। अलगाव और अफसरवादिता की राजनीति की हांडी जलाकर राख ही कर दी। अब रोये पांच साल तक। बहा लो टेसू साइकिल, लालटेन, हाथी और झोपड़ी के नाम पर। कमल भी मुरझा गया। आखिर कब तक गोधरा और बाबरी मस्जिद की त्रासदी झेलेगी जनता। अब दंगे नहीं, शांति और तरक्की चाहिए भाई। तरक्की। चैन से रहने के लिए।
मुलायम, लालू और पासवान अब फड़फड़ा रहे हैं राजनीति में जीवित रहने के लिए। सबसे ज्यादा लालू। पिछले दो दशक में ऐसा पहले बार होगा कि वह सत्ता से बेदखल गुमनामी में जीने को मजबूर होंगे। मुलायम की लुटिया भी हिचकोले खा रही है कब डूब जाए कयास तेज हैं। वहीं पासवान पिघल गए जनता के अक्रोश की आंच में। खुद की सीट भी नहीं बचा पाए दलितों के मसीहा। देर से जरूर पर ठीक हुआ जनता को भेड़ समझने वाले इन नेताओं के साथ। आखिर बहुत खेल खेल लिया था दोस्ती और दुश्मनी का। अबकी भेड़ की तरह नहीं हंकी जनता। विधानसभा में कट्टर दुश्मन और लोकसभा में भाईगिरी नहीं चली। जनता ने सबक दे ही दिया या तो दोस्त रहो या दुश्मन। मनमर्जी नहीं चलेगी। मतदाता बेवकूफ नहीं है कि हर बार इशारों पर नाचे। अहम तोड़ दिया। और ऐसा तोड़ा कि संभलना मुश्किल है।
वहीं उप्र को खुद की बफौती समझने वाली कुंवारी बहन जी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोय बैठी थीं। खूब ताल ठांेक रही थी। 21 सीट ही ले सकी। सुंदर सपना टूट गया। जातिवाद नहीं चला। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाए के समीकरण भी ध्वस्त हो गए। हालत ये हो गई है इन सपनों के प्रधानमंत्रियों की कि यूपीए को बिन मांगे समर्थ देने को लालायित हैं। समर्थन आलू, बैंगन टमाटर हो गया है। ले ले बिना शर्त के। अंदर से बाहर से बस ले ले। ताकी बचे रहें। गुजर बसर होती रहे।
याद हो यह वहीं नेता हैं जो महीने पर पहले बहुमत में आई पार्टी को बिना कंठ गीला किया कोसते थे। दावा करते थे उनके बगैर देश को प्रधानमंत्री नहीं मिल सकता। और अब तेवर कैसे बदल गए। बांगडूओं को शर्म तक नहीं आ रही। मीडिया पुराने बयान और वीडियो पर सवाल दाग रही है। पर वह बस समर्थन देने की बात पर टिके हैं। यूपीए नहीं ले रही है। न उसे चाहिए। पर जबर्रदस्ती दे रहे हैं। जनादेश को वाकई सलाम करने का मन है आज। दिखा दिया काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती।

गुरुवार, 7 मई 2009

पप्पू एक छलावा और नेताओं का पाप है

राहुल कुमार
चंद स्वार्थी और खुद को दूसरे से ज्यादा जागरूक समझने वाले कथित लोगों ने वोट की ऐसी लहर चलाई कि पप्पू शब्द ही घृणित कर दिया। हर तरफ पप्पू न बनने की गूंज है। पप्पू मत बनिए वोट डालिए। आपका वोट सरकार बदल सकता है। लोकतंत्र में भागीदार बनो आदि इत्यादि। जैसे आप पप्पू बन गए तो इस धरती पर रहने के काबिल ही नहीं है। पप्पू होना दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है। सरकार से लेकर खबरिया चैनल, बकबक करने वाले एफएम और पत्र-पत्रिकाएं पप्पू न बनने का दबाव डाल रही हैं। इस सारी मुहिम में पप्पू नाम वालों का क्या हुआ होगा मैं नहीं जानता पर यह जरूर समझ सकता हूं कि यह पप्पू साधारण नहीं है। बड़ी चाल है। और इसके पीछे वही गंदी राजनीति जान पड़ रही है।
जानता हूं कि वोट देना हक है और हर व्यक्ति को वोट देना चाहिए। लेकिन जिस तरह मतदाताओं पर जबर्दस्त दबाव बनाया जा रहा है वह पच नहीं रहा है। वोट लेने के लिए नेताओं ने पूरा प्रोपेगंडा रच डाला हैं। पप्पू कह कह कर मतदाता को इतना जलील करने की मुहिम चला दी है कि वह पप्पू शब्द से घृणा करने लगा है और इसी डर से की कहीं वह घृणित प्राणी न हो जाए वोट डालने जा रहा है। इसमें जागरूक करने की कौन सी बात है? यह तो सरासर डराना और धमकाना है। जिसमें सरकार से लेकर मीडिया तक शामिल है।
आखिर समझ नहीं आता यह पप्पू पप्पू क्या है। हर खास बनने की ललक वाला लंपट प्राणी पप्पू के नाम को भुना रहा है। जो भी चार पत्रकारों की प्रेस वार्ता का खर्चा उठाने में सक्षम है वह पप्पू का मसीहा बन बैठा है। वह मीडिया से जरिये अपील कर रहा है कि पप्पू मत बनिए। वोट देने वाले को वह दवाईयां मुफ्त देंगे। मुफत में बूट पोलिश करेंगे, मनोरंजन पार्काें और मल्टीप्लेक्स में छूट देंगे, बस वोट डालने जाओ। उनकी बात मानों क्योंकि वह अपील कर रहे हैं और अपील करने की उनकी हैसियत है। यह वही छपास के रोगी हैं जो मीडिया पर कुछ खर्च कर चमकने की लालसा रखते हैं और कामयाब भी होते हैं। इन सालों से पूछा जाए कि इनके घर के सदस्य कितने वोट देते हैं तो आंकड़ा शून्य ही निकलेगा। और छूट देना किस मानसिकता को उगाजर करता है वह भी साफ हैै। क्योंकि अमीर आदमी तो छूट के लालच में आएगा नहीं। इसका मतलब वह समझते हैं - पप्पू गरीब मतदाता है जो छूट के लिए और बूथ पोलिश के लिए वोट डालने आ जाएगा।
अफसोस इस बात का है कि इस परिस्थिति के लिए भी आम जनता को ही दोषी ठहराया जा रहा है। जिसके पास पैसा है वह जागरूक करने वाला बन बैठा है। जागरूकता की परिभाषा तय करने का मानक क्या है ? किसी को वास्ता नहीं। साथ ही आहत इस लिए भी हूं कि मतदाता पर सब चढ़ बैठे हैं। आखिर यह हालात पैदा किसने किए ? ऐसा कौन सा नेता है जिसे अपना मत दिया जा सके। खैर आप कहेंगे कि पप्पू न बनने के लिए फाॅर्म नंबर 17 इस्तेमाल किया जा सकता है। पर क्या यह सवाल खड़ा नहीं होता कि पांच साल के लिए चुन लिए जाने वाले नेताओं के लिए ऐसी मुहिम क्यों नहीं चलाई जाती। क्यों सरकार ऐसे विज्ञापनों का इस्तेमाल उन नेताओं के लिए नहीं करती जो पांच साल सत्ता सुख भोगने के बाद भी विकास की उपलब्धियोें में शून्य होते हैं। आज तक क्यों नेताओं के पप्पू बनने की बात का प्रचार नहीं हुआ। मीडिया, सरकार और खुद को जागरूक कहने वाले कथिक समाज सुधारक घोटाले करने वाले भष्ट्र नेताओं के लिए आगे नहीं आए। क्यों जनता को ऐसे नेताओं के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए जागरूक नहीं किया जाता है। और जनता को ही क्यों जागरूक किया जाए, क्या भला वही सोई है। इन बांगडू नेताओं को जागरूक क्यों नहीं किया जाता। जो सत्ता में आते ही टमाटर की तरह लाल हो जाते हैं और आसमान छूती कोठियों का स्वामी बन बैठता है। पप्पू बनने के लिए क्या महज मतदाता ही है। यह साजिश के अलावा और कुछ नहीं। पप्पू एक छलावा है जो नेताओं का बनाया हुआ पाप है। अपने पाप को छुपाने के लिए सरकार ने यह पप्पू पैदा किया है और मतदाताओं को उलझा कर फिर से अपना उल्लू सीधा किया है।

मंगलवार, 5 मई 2009

पत्रकारिता पर रोने के लिए दुखड़ा बदलो

राहुल कुमार
पत्रकारित्रा के छात्र जीवन में जितने भी नाम चीन पत्रकार हमें लेक्चर देने विश्वविद्यालय आते ज्यादातर अपनी संघर्ष की कहानी सुनाते थे। और छात्र अधिकांशतः एक ही सवाल पूछते- पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन ? असल में मैं भी इस जाल में ऐसा फंस गया था कि हर संभव इसका जवाब ढूंढने की जुगत में लगा रहता। इसके अलावा छात्र जीवन के बाद अब नौकरी में दौरान भी गोष्ठी के नाम पर एकत्रित हुए बड़े पत्रकारों को भी एक दो विषयों से इतर बहस करते नहीं देखता हूं।
छात्र जीवन में ग्वालियर में कई गोष्ठियों में शामिल हुआ लेकिन मुद्दे हमेशा एक से ही पाए। पहला संपादक की सत्ता पर प्रबंधक का दवाब, दूसरा खबरों से ज्यादा विज्ञापन की बढ़ती अहमियत, और तीसरा भाषा का गिरता स्तर। जिसमें बड़े पत्रकारों का भाषा को लेकर रोना और सुधारने के लिए लंबी दुहाईयां और नए पत्रकारों को जमकर कोसना शामिल होता था। सौभाग्य से दिल्ली में भी एक गोष्ठी में शामिल होना का मौका जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार अमित प्रकाश जी के सहयोग से मिला। गोष्ठी का विषय था स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के जोखिम और चुनौतियां। जिसमें देश के बड़े अखबारी और खबरिया चैनलों के पत्रकारों ने अपने मत रखे। गोष्ठी में हिंदी निदेशालय के निदेशक और दिल्ली विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की प्रोफेसर भी शामिल थीं। इसके अलावा नवोदित पत्रकारों को भी बोलने का मौका दिया गया।
वक्तवों में भाषा, संपादक की सत्ता और विज्ञापन के प्रभाव जैसे मुद्दों के इर्द गिर्द ही सारी गोष्ठी के मत घूमते रहे। लेकिन पत्रकारिता की चुनौतियां और जोखिम और भी हैं। गोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ने अपना महिला होने का धर्म निभाते हुए मीडिया पर स्त्री देह को इस्तेमाल करने बात कही। यह मुद्दा मेरे लिए नया तो नहीं पर गोष्ठी में किसी महिला से पहली बार सुना था। सो नया लगा।सोचता हूं कि गोष्ठियांे के पास क्या इन मुद्दांे, विषयों के लिए की गई बहसों के अलावा कुछ और नहीं होता। पत्रकारिता में भाषा गिरी है पर है तो, वह भी जनमानस के हिसाब से तब्दीली के साथ पनपी है। संपादक की सत्ता प्रभावित हुई पर वह भी अस्त्तिव में है। संपादक नाम का प्राणी आज भी खबरों का मुखिया और जवाबदेह है। वहीं खबरों और विज्ञापन में दोनों का महत्तव बराबर है। और जब तक पत्रकारिता रहेगी दोनों की बराबर अहमियत बनी रहने की संभावनाएं हमेशा जीवित रहेंगी।
लेकिन पत्रकारिता जिस बात से सबसे ज्यादा पतित हो रही है उस मुद्दे को कोई छूता ही नहीं है। मैं समझता हूं कि इस विधा के बगैर पत्रकारिता पूरी तरह लुप्त हो जाएगी। जिसपर किसी का ध्यान नहीं है। खासकर इसके बगैर पत्रकारिता बेहद मुश्किल व गुणवत्ता के साथ बना रहना कठिन है। जिस संस्कार से ही देश के बढ़े पत्रकार आज नाम कमा चुके हैं। उन्हीं का ध्यान अब इस संस्कार पर नहीं है। मैं बात कर रहा हंू गुरू शिष्य परंपरा की। जो आज की पत्रकारिता में खो चुकी है। कथित बड़ा पत्रकार न्यूकमर को अपने गुर देेने से इतना डरता है कि कुछ पूछते ही पत्रकारिता में आने की बात को ही दुर्भाग्य कह उठता है। अगर मजे पत्रकार नवोदित पत्रकारों को गुर नहीं देंगे तो कैसे यह पेशा गुणवत्ता के साथ बना रह सकता है। सभी जानते हैं कि प्रभास जोशी बने तो राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर जैसे लोगों के बीच रहकर। साथ ही जनसत्ता जब अपने उफान पर था तो आज कई संस्थाओं के उच्च पदों पर बैठे बड़े पत्रकार यहीं पत्रकारिता के गुर सीखा करते थे। लुप्त हो चुके इस संस्कार से पत्रकारिता जरूर गलत दिशा में जा सकती है। गोष्ठियों में इस मुद्दे पर बहस करने वाले शायद ही मिले। लेकिन खुद को बुद्धिजीवी की श्रेणी में रखने के लिए वह संपादक की सत्ता और भाषा के गिरते स्तर पर खूब हिचकियां भरते हैं। महोदय पत्रकारिता पर रोने के लिए और भी खूब मुद्दे हैं। पर इसके लिए जरा यथार्थ पर आना होगा। समय पर और जरूरत के हिसाब का वेतन मिलना भी बड़ा मुद्दा है ?

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

ये जूता चलना चाहिए

राहुल कुमार
हालांकि गृहमंत्री पर जूता फेंकने के बाद जनरैल ने अपनी गलती मानते हुए कहा कि उनका विरोध करने का तरीका गलत था। वह भावनाओं में बह गए थे। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वाकई एक पत्रकार का धर्म यह नहीं है। उसे कलम को हथियार बनाकर अनीति के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन मानता हूं पत्रकार के इतर जनरैल का कदम एकदम सही है। चुप्पी की दुनिया मिटाने के लिए ये जूता चलना ही चाहिए। खासकर हर उस जगह जहां अन्याय है। जहां तानाशाही चलती हो। जहां निज स्वार्थांे के चलते लोग विरोध करना भूल गए हैं और चुपचाप सब कुछ सह रहे हैं। जनरैल को ही ले लें। जब तक वह कांग्रेस की इस नीति के खिलापफ लिखते रहे क्या हुआ....? जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दे दिए गए। अगर जूता नहीं चलता तो वह चुनाव भी जीत जाते और मंत्री भी बना दिए जाते। ऐसी जगह कुछ अनुचित लोगों के साथ उचित न्याय हो गया तो जूता चलना क्या गलत है। बल्कि यह जूता हमारे देश में हर जगह चलाने की जरूरत दीखने लगी है। यह जूता वहां चलना चाहिए जहां सरपंच, कलेक्टर, विधायक, मंत्री ने लेकर सभी जिम्मेदार व्यक्ति आराम फरमा रहे हैं वहीं किसान दो जून की रोटी न कमा पाने और ऋण न चुका पाने की स्थिति में आत्महत्या करने को मजूबर हो रहे हैं। क्या यह जूता उन लोगों पर नहीं चलना चाहिए। क्या अभी शांति से बात कर व्यवस्था को सुधारने की कुछ योजनाएं लाने की जरूरत रह गई है। या फिर जूता चलाकर लापरवाहों को उनकी सही स्थिति दिखाने की नौबत आ गई। यह जूता हर उस बाहुबली पर चलना चाहिए जो दबंगई दिखाकर किसी दलित महिला के साथ......... यह जूता उस पुलिस व्यवस्था पर चलना चाहिए जिसकी गस्ती में चार गुंडे किसी भी लड़की को उठा ले जाते हैं। यह जूता वहां चलना चाहिए जहां एक शिक्षक को अपने ही फंड का पैसा निकालने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है। यह जूता वहां भी चलना चाहिए जहां जाति के नाम पर लोग विरोध कर रही टीम से अलग हो जाते हैं और वहां भी चलना चाहिए जहां छात्रों से मोटी फीस लेकर बैठने तक की जगह नहीं दी जाती। क्लास और जरूरी संसाधनों के लिए छात्रों को पढ़ाई छोड़कर सड़कों पर संघर्ष के लिए उतरना पड़ता है। आखिर यह जूता वहां क्यों नहीं चलना चाहिए जहां प्रतिभा को दबा कर सिफारिश को प्राथमिकता दे दी जाती है। जहां मंदिर, जाति और क्षेत्र के नाम पर गंदी राजनीति कर लोगों का बेघर कर दिया जाता है। जनरैल का जूता महज भावनात्मक प्रतिक्रिया हो, लेकिन संदेश देता है कि जूता चलाने का वक्त आ गया है। शांति से बैठना और गांधी नीति से व्यवस्था को सुधारने का वक्त खत्म हो चुका है। पाप का घड़ा इतना भर गया है कि गंाधी जी के सिद्धांतों को चलाना लाजमी न होगा। चुप्पी तोड़ दो दोस्त और हर अन्याय के सामने जूता लेकर खड़े दिखाई दो। देखना जो कायर व्यवस्था को दूूषित किए हुए हैं कैसे सुधरते हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2009

गांधी तेरे देश में गांधी बिगड़ गया

जी हां, इसमें नया कुछ नहीं है। वरूण का बयान महज सस्ती लोकप्रियता पाने और चुनावी राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं माना जा सकता। चुनाव से पहले ऐसा कुछ तो करना ही था जिससे वह मीडिया में छा सके। वरूण ने एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगल कर वही किया जो भाजपाई अब तक करते आए हैं। और फिर भाजपा की शैली भी तो यही है। अब भला क्यों बड़े भाजपाई वरूण बयान से पल्ला झाड़ रहे हैं। उमा भारती हो, प्रवीण तोगड़िया या फिर गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सबकी शैली एक सी है। कुछ हिंदू भड़काओ और वोट पाओ। पर अफसोस कुछ हिंदू इनकी गंदी राजनीति में अपना सुरक्षित भविष्य देखकर प्रभावित हो रहे हैं।
वरूण कह रहे हैं सीडी से छेड़छाड़ की गई है। न तो आवाज उनकी है और न ही शब्द। जनाब गांधी जी आपको लगता है कि आपकी राजनीति इतनी प्रबल है कि कोई पार्टी आपसे भयभीत होकर आपकी धूमिल छवि बिगाड़ना चाहेगी। अगर ऐसा ही है तो आपकी पार्टी में आडवाणी, वाजपेयी सरीखे अन्य बड़े नेताओं की सीडी बनाकर खबरिया चैनल को कब की बेच दी जाती। या फिर आप अपने पिता के नक्शे कदम पर चलने की सोच रहे हैं। तानाशाही और भड़काउ प्रवृत्ति से प्रेरित।
खैर यहां मैं धर्मनिरपेक्ष औैर लोकतंत्र भारत की दुहाई नहीं दूंगा। क्योंकि यह तो कब के अपंग और विवश हो चुके हैं। लेकिन पीलीभीत के अधिकारी जरूर इस राजनीतिक लोलूपता में पिस गए। साथ ही इस बयान बखेड़ेबाजी से वरूण का फायदा ही हुआ है। वह जो चाहते थे उन्होंने पा लिया। चुनाव से पहले चर्चित चेहरा बनना। साथ ही मीडिया कवरेज न पाने का डिप्रेशन भी दूर हो गया होगा। सस्ती लोकप्रियता का इससे अच्छा रास्ता शायद ही उन्हें मिल पाता। खैर भाजपा ने दिखावे के लिए किनारा कर तो लिया पर आप चुनाव जीतोे सब ठीक हो जाएगा। वरूण तुम सही हो भाजपा के नक्शेकदम पर ही चल रहे हैं पार्टी में आगे बढ़ोगे।
पर अफसोस इस तरह के बयान देकर लोकप्रियता पाने वाले कथित नेता भूल जाते हैं कि भारत वही देश है जिसके निवासियों ने एक होकर 1857 में अंग्रेजों के हौंसले तोड़ दिए थे। यह वह देश है जब गांधी के नेतृत्व में हिंदू और मुसलिम साथ साथ लाठियां खाते थे। लेकिन यह उन लोगों का देश भी है जो अब तक इंसान नहीं बन पाएं हैं..... आपको किस खेमे में रहना है आप तय करें......? हमारी बला से
राहुल कुमार

रविवार, 8 मार्च 2009

मैं स्लम डॉग बोल रहा हूं

जानता हूं बहुत देर बाद बोल रहा हूं। पर बोल रहा हूं। क्योंकि विदेशी ही नहीं अपनों ने भी यह हालात पैदा कर दिए हैं कि मुझे बोलना पड़ रहा है। बहुत को बुरा लगेगा, मेरा बोलना नहीं सुहायेगा, पर मेरी बला से लगता रहे। मैं बोलने को लालायित हो उठा हूं। खासकर तब से जबसे बड़े पत्रकार और संपादकों को खुद पर टिप्पणी करते देख रहा हूं। विदेशियों ने मुझे ऑस्कर के बहाने भरे चौराहे नंगा दिखाया मैं नहीं बोला। मेरे नाम पर कुछ भारतीयों को ऑस्कर दिलवाया और मेरी फ्रिक का झूठा संदेश देना चाहा, मैं नहीं बोला। मैं तब भी नहीं बोला जब मुझे एक महानायक का इतना दीवाना बता दिया कि मल की गंदगी में कुदा दिया, खास कर तब भी नहीं जब नायिका को रिंगा रिंगा पर वैश्यालय में ठुमके लगाते दिखा दिया गया। क्योंकि यह कहीं न कहीं सच हैं। और इसलिए भी नहीं बोला कि मैं विदेशियों से क्या बोलू। जब सदियों से घृणा और तिरस्कार अपने ही देशवासियों से सहता रहा तो विदेशियों से कैसे उम्मीद रखूं कि वह मेरे लिए अच्छा सोचेंगे। उन्होंने भी मेरी नंगई दुनिया को दिखाई और खूब नाम कमाया।
मैं इसलिए बोलने को तड़प उठा हूं जब देश का चैथा स्तंभ संपादकीय लिख रहा हैं कि विदेशियों ने हमारी गरीबी को कैद कर नाम कमाया है। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि उसे ऑस्कर दिए जाएं। ऑस्कर का यह सम्मान भारत की हथियारों से सशक्त और आर्थिक रूप से सुदृढ़ छवि को मिटाने की एक योजना भर है। विदेशी आज भी यह जताना चाहते हैं कि भारत आज भी भूखों नंगों का देश है।
मैं तब बोलने के लिए उत्सुक हुआ हूं जब कहा जा रहा है कि फिल्म को ऑस्कर मिला पर स्लम में रहने वालों का क्या हुआ, उन्हें क्या मिला....? वह स्लम डॉग तो आज भी वैसे ही हैं जैसे थे। सच है और उम्दा सच है। क्योंकि मेरी नियति ही यह है। मुझे कोई दुख नहीं विदेशियों ने मेरी इज्जत से खेला और वैष्विक स्तर पर नंगा कर दिया। लेकिन मैं आहत उन अपनों से जो यह कह रहे हैं कि मुझे क्या मिला। मैं पूछना चाहता हूँ उन बड़े लेखको से कि मैं तो सदियों से तुम्हारा हूं। तुमने क्या दिया....? जब से मानव सभ्यता बनी तभी से घृणित और तिरस्कारित हूं। मैंने वो दौर भी झेला है। जब मेरी परछाई से भी सभ्य अपवित्र हो जाते थे। मुझे चप्पल पहनने की इजाजत न थी। मैं शमशान में रहता था और दिन उगने से पहले या दिन डूबने के बाद भोजन के लिए निकलता था। ताकी परछाई किसी पर न पड़ जाए। भोजन के लिए उन बंद दरवाजों की दहलीज से जूठन उठा उठाकर खाता था जो मेरा चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते थे। इसलिए दहरी पर जूठन रखकर दरवाजे बंद कर लेते थे और मुझे हाथ में थमाई थाली बजाकर गांव में प्रवेश करना पड़ता था ताकी सब छुप जाए। मेरा मनहूस चेहरा कोई देख न पाए। सब जान जाए मैं यानी अछूत यानी स्लमडाॅग आ रहा हूं।
मैं बताना चाहता हूं यह वही देश हैं जहां धर्म के कुछ चंद ठेकेदार मंदिरों में भी मुझे नहीं जाने देते। दबंगों और बाहुबलियों की हवस का शीकार मैं कई बार हुआ हूं। घर की लड़कियां बेची गई और इसी देश में ही खरीदी गईं। हां मैं इसी देश का स्लम हूं जहां जन्म लेने वाली लड़कियों का भविष्य या तो दबंगों को खुश करने में है वेश्यालय में। हां, मैं वही दूर दराज का स्लम हूं जिसकी लड़की और उसकी मां के साथ महज इसलिए रेप किया जाता है कि वह आठवीं कक्षा में सारे गांव में अव्वल आई है। जी हां, मैं वही स्लम हंू जिसपर गंदी राजनीति होती है। जिससे वोट बैंक बनाया जाता है। जिसे हर कोई दबाना या खरीदना चाहता। वहीं स्लम जिस पर लिख लिख कर कई कथित विद्धान खुद को दलित साहित्यकार बताते हैं। और उंचे ओहदे पर जम गए हैं तरह तरह के वादी वाले साहित्यिक संघ बना डाले हैं।
फिर कैसे आप सब लोग विदेशियों से यह कह सकते हैं कि उनने ऑस्कर जीत लिया पर मुझे क्या मिला। जाहिलों जब तुम और तुम्हारा देश इतने सालों में मुझे कुछ न दे सका तो विदेशी एक फिल्म का मुझे क्या देंगे। तुम्हारे साहित्यकार, राजनेता, हवस की प्रेमी सब ने मुझे प्रयोग किया पर किसने क्या दिया....? तो विदेशियों से आश लगाना तुम्हारी लोलुपता ही है।
सबसे ज्यादा आहत तब हूं जब पत्रकारों और संपादकों को लिखते देख रहा हंू कि स्लम डॉग को क्या मिला। यह साजिश है। भारत के खिलाफ। हंसता हंू खुद की स्थिति को देखकर जब उन पत्रकारों और संपादकों को लिखते देख रहा हूं जिसके अखबार में सख्त आदेश हैं कि 15000 से कम आय वाले व्यक्ति की कोई खबर नहीं छपेगी। अखबार का टारगेट इससे ज्यादा मासिक आय पाने वाले व्यक्ति हैं। संवाददाताओं की स्लम पर लिखी खबरों को कचरें से डब्बे में फेंक देने वाले उन संपादकों को लिखते देखता हूं तो महज अखबार का एक काॅलम और खुद की खेलनी चमकाना चाहते हैं और पूछतें हैं मुझे क्या मिला..........?

राहुल कूमार

बुधवार, 4 मार्च 2009

विश्वास गहराता जाता है

जाने क्यूं जब जब भी रिश्तों को टूटते देखता हूं तो उन पर और भी गहरा विश्वास होता है। सोचता हूं मैं अपने जीवन में किसी भी रिश्ते को टूटने नहीं दूंगा। इसके लिए मुझे कितना भी असह दर्द क्यों न सहना पड़े। टूटते रिश्तों को महसूस करने के बाद जाने क्यों उन्हें निभाने की अजीब सी जुस्तजू खुद व खुद जाग जाती है। दूसरे ही पल हर कीमत पर रिश्तों को निभाने के लिए तत्पर हो उठता हूं। क्योंकि बगैर रिश्तों के जीवन में कोई रंग है ही नहीं। वह लोग जो अकेले जीते हैं कितने बेबस और प्यार के बिना होते हैं। बगैर सच्चे दोस्त, मां, पिता, भाई, बहन, प्रेमिका, और भी न जाने कितने प्यारे रिश्तों से परे। खूब खुशियाँ देने वाले रिश्ते। जहां अपनापन और अस्त्तिव का अहसास मिलता है। जहां एक ऐसी बेफ्रिकी मिलती है कि सारे डर खत्म हो जाते हैं। छल, कपट, धोखा, और ओझेपन नाम की कोई चीज दरमियां नहीं होती। प्यार भरा घना साया मिलता है इन रिश्तों की छांव में। जहां मां का खुद भूखा रहकर बच्चों को खाना खिलाने का त्याग है, पिता का सालों थिगरी लगी कमीज पहने रहकर बच्चों को हर जन्मदिन पर नई पोशाक दिलाने की चाह है, जहां छोटे भाई की खुशी के लिए बड़ा भाई जानबूझकर खेल में हार जाता है और हार में जीत का आनंद लेता है। इतना प्यार की बहिन छोटे भाई को कभी कपड़े नहीं धोने देती। दोस्त, दोस्त के लिए जीवन न्यौछावर कर देता है। प्रेमिका का ऐसा साथी जिसकी याद आने भर से दुनिया भर की बालाएं टल जाती हैं। कितनी प्यारी और गहरी है ये रिश्तों की दुनिया।

सच कहूं तो वहीं लोग रिश्तों को निर्दयता से तोड़ते हैं जिन्हें रिश्तों की समझ नहीं होती और उनसे मिलने वाले प्यार के अहसास को वह अनुभव नहीं कर पाते। वरना इन गहराईयों को कौन ठेस पहुंचाना चाहेगा। इसके पीछे अकसर एक तर्क ढूंढता रहा हूं कि ऐसे क्या कारण होते हैं कि जिन्हें छोड़ देने के बजाये लोग रिश्ता तोड़ लेते हैं। साथ ही ऐसा क्यों होता कि रिष्ता तोड़ने के कारण पनप आए। खासकर जो आपका है और आपके दुख से आहत हो जाता हो। उससे।

जब जब भी मनु भंडारी का उपन्यास आपका बंटी पढ़ता हूं तो रिश्ता तोड़ने से डरता हूं। डरता हूं जब लोगों को तड़पते और पश्चाताप करते देखता हूं। खूब देखा है मैंने। पर फिर भी तोड़ देते हैं लोग रिश्ता तोड़ देतें हैं। जब देखता हूं भारत और पाकिस्तान की बाड़ में परिवारों के बंटने का दर्द और कभी न मिल पाने की बेबसी। जब लोगों का पलायन करने की मजबूरी और जेहन में हर वक्त कौंदते रहने वाली टीस महसूस करता हूं, तो रिश्ता तोड़ने से डरता हूं। अपनी जमीन से, अपने गांव से, अपने कस्बे से बिछुड़ने चुभन रह रह कर पाता हूं। जहां बचपन बढ़ा हुआ। जहां पहला प्यार मिला। जहां की नीम व बरगद की छांव आज भी बुलाती है। उन पहाड़ों की पुकार जिन पर बैठ कर कई दोपहर सांझ में ढाल दी थी और घंटों अपने गांव को निहारा था। गांव की वह पथरीली और कांटे भरी पगडंडियां जहां नंगे पैर चलने का अपना ही आनंद था। सभी रिश्तों को महसूस करता हूं तो डर जाता हूं रिश्ता तोड़ने से।

परिवार वाले हो या यार दोस्त सभी के चेहरे देखकर रिश्ता निभाने की कसम खाता हूं। फिर कहां मिलना जिंदगी में इन लोगों को। अच्छा है कि जिनकी याद में कल तड़पना पड़े उन्हें आज ही जाने से रोक लिया जाए। वरना समय फिर नहीं लौटना और न ही वह साथी जिसे खो दिया है।
राहुल कुमार