गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

साल के जाते-जाते

राहुल कुमार

चार अंकों का साल जाने को है। और चार अंकों का ही आने वाला। बस एक नंबर बढ़ गया है। हमेशा की तरह। इस बात से बेखबर की नया क्या है। लोगों में बेहद खुशी है। चारांे तरफ चिल्ल पों है। शोर शराबा। नए साल के स्वागत में लोग पागल हुए जा रहे हैं। सब की अपनी अपनी खुशियां और योजनाएं हैं। नए कपड़ों, नए स्थलों, नए आइडिया, नया करने के जोश के साथ। नए साल का स्वागत।

नए साल के पहले दिन सभी नया करने को बेताब हैं। लेकिन नया क्या किया जाए। परेशान हैं। बावजूद सब वही पुराने ढर्रे पर चल पड़े हैं। रात भर जाम के नशे में चूर होंगे। सुबह सूरज चढ़ने के बाद ही आंख खोलेंगे। जाम और थिरकन का खुमार बाकी रहेगा। साल के जाते जाते ज्योतिषी भी चीख रहे हैं। सभी राशियों का भाग्य तय कर रहे हैं। कौन नए साल में किस तरह की तरक्की पाएगा। लेकिन फिलहाल लोग जाम के नशे में नववर्ष सेलीब्रेट करने को बेताब हैं। झूमने को लालायित।

लेकिन सोचता हूं दिन का ढलना, शाम का चढ़ना, रात का मुब्हम अंधेरा, और फिर सुबह की विजयी मुस्कान। सब कुछ वैसी ही होगी जैसी है। और हमेशा से रही है। प्रकृति ने कभी खुद को नहीं बदला। रात की तन्हाईयों में सुबह के इंतजार में करवटें बदलने ने अदा नहीं बदली। सालों से वही हैं। दोपहर का बीतना। महीनों का आना-जाना। ऋतुओं का बदलना। दिन का उतार-चढ़ाव। रात का बढ़ना-ढलना। शाम का सहरा। सब कुछ हमेशा की तरह। वैसा ही बना रहेगा।

तो फिर सवाल कुलांचे मारता है कि नया क्या है नए साल में ? नए कपड़े पहनना ? नए तरीके से नाचना ? अच्छा खाना ? अच्छी शराब ? आखिर क्या ? शायद यह कि कुछ पुराने चेहरे से नाता तोड़ कर नए से रिश्ता गांठना ?

ऐसे में अपुन ने तय किया है कुछ नया करने का कोई संकल्प नहीं लेना है। जो सामने आएगा देखा जाएगा। साहस के साथ मुखाबित होंगे। हर अच्छे-बुरे से। जीवन की विसात पर शह और मात का खेल खेला जाएगा। बने बनाए सांचे से इतर। जाते साल को सलाम करते हुए नए साल के इंतजार में अपुन भी हैं। जाते साल का दिया अच्छा-बुरा लिए दबे पांव लेकिन उछलते कूदते नए साल में जाने को तैयार। डूबते साल ने बहुत कुछ दिया। इसलिए शुक्रगुजार हंू उसका। जीवन में कुछ खास जोड़ने वाला। नए साल से ढेरों उम्मीदें हैं। जीवन को खास बनाने और तराशने वालीं। पूरे साहस के साथ तैयार हूं। नए साल के लिए। आओ। और देखें इस विसात पर कौन शह खाता और कौन मात। क्या पाना है और क्या खोना।

आप सभी को भी नववर्ष की पहली किरण के साथ ढेर सारी खुशियां मिलने की कामना करता हूं। सभी का शौर्य, साहस, उत्साह, बना रहे। सभी संकल्प जो ले लिए हैं पूरे हो। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ। बाकी सब नए साल में।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

एक संस्मरण : खो गई, वो पहली सी वैदेही

राहुल कुमार
जैसे ही स्टेषन से बाहर निकला कि पूस माह की ठंडी हवा कमीज को भेदते हुए सीधे सीने में चुभने लगी। पहले ही झटके में समझ गया कि स्टेषन पर सुबह तक इंतजार करना सेहत के लिए ठीक न होगा। सो टैक्सी स्टैंड पर फोन लगाकर एक बुलेरो गाड़ी मंगवा ली। और उसमें बैठ कर सीधे अपने घर दिनारा की ओर चलना तय किया। मैं करीब चार महीने बाद घर वापस लौट रहा था। लेकिन किराये की बुलेरो से रात में जाने का यह पहला मौका था।
तकरीबन 25 मिनट के बाद ही दिनारा की दहलीज में हम दाखिल हो गए। बातों बातों में पता चला कि चालक दिनारा कस्बे का ही है। लेकिन मैं परिचित नहीं था। पिता जी का नाम बताते ही उसने चहक कर कहा था आप दिल्ली में रहते हो। गाड़ी कस्बे के पहले मकान को ही लांघी थी कि दसवीं कक्षा का वह रिष्ता याद आ गया जो आज भी गुदगुदाता है। और जिसकी खबरें मुझे टुकड़ों टुकड़ों में जवानी तक मिलती रही थीं। वैदेही का वह तीखा नाक नक्ष और सुंदर बादामी गोल बड़ी-बड़ी आंखों वाला चेहरा मेरे सामने घूमने लगा। वैदेही और मैं अंग्रेजी का ट्यूषन सक्सेना मास्साब के यहां पढ़ते थे। वैदेही अपनी सुंदरता के चलते जल्दी ही गली मोहल्ले और स्कूल के लड़कों की नजर में आ गई थी। और हर कोई उससे दोस्ती बढ़ाने और रिष्ता गांठने की फिराक में रहता था। वैदेही से मेरा रिष्ता दो तरह से था। एक तो हम दोनों के पिता एक ही स्कूल मंे षिक्षक थे। दूसरे, मैं जब भी ट्यूषन के लिए लेट हो जाता तो वह मेरा कागज नोट्स के लिए मास्साब के कागज और कार्बन पेपर के नीचे लगा देती थी। ट्यूषन खत्म होने के बाद मुझे पता चलता कि मेरा कागज भी मास्साब की नत्थी मंे था। इससे अधिक वैदेही से मेरा कोई रिष्ता कभी नहीं रहा। अपने संकोची स्वाभाव के चलते मैं न तो कभी उससे बात कर सका और न निगाह भर देख सका। बस सुनता था कि वह बला की खूबसूरत है। और इतनी सुंदर है कि पूरी तहसील में उसके मुकाबले लड़की नहीं।
वैदेही का झुकाव ही था कि मैं अन्य लड़कों की नजर में खास बन गया था। लड़के हरसंभव मेरी सोहबत करना चाहते। करीब आकर मुझे बहलाने और दोस्ती गांठने की कोषिष में रहते। मेरी आवाभगत करते। गर्मजोषी से स्वागत करते हुए हाथ मिलाते। इनमें दो लड़के जीतेंद्र और अनिल वैदेही की वजह से ही मेरे दोस्त बने थे। वह वैदेही की तरफ झुकाव रखते थे और मुझ पर लगाम लगाना चाहते थे। लेकिन मैं पहले ही अपने स्वाभाव के चलते इन सब मामलों मंे पड़ने वाला नहीं था।
जीतेेंद्र और अनिल की दांत काटी दोस्ती थी। ऐसी की एक दूसरे के बगैर कोई काम न करते। दोनों ने तय किया कि वैदेही की अन्य लड़कों से रक्षा करेंगे और उसे अपना बना कर रहेंगे। वैदेही के मन में क्या था मैं कभी नहीं जान सका। दोनों दोस्त बड़े चालक थे। पहला यानी अनिल वैदेही का दोस्त बन गया और दूसरा यानी जीतेंद्र उसका प्रेमी बन बैठा। दसवीं की परीक्षा नजदीक आ गई थी। मैं पढ़ाई में मषगूल हो गया। परीक्षा खत्म होते ही मुझे ग्वालियर भेज दिया गया। और बाकी पूरी पढ़ाई ग्वालियर में ही की। दिनारा आना जाना लगा रहा।
जब भी ग्वालियर से दिनारा आता तो जीतेंद्र और अनिल से मुलाकात हो जाती। और बातों बातों में अन्य लोगों से कभी कभार वैदेही, अनिल व जीतेंद्र के किस्से सुनने को मिलते रहते। इसी बीच सुना था कि अनिल को किसी ने वैदेही के घर के सामने 12 बार चाकू मारकर कत्ल कर दिया। जीतेंद्र ने जहर खाकर आत्महत्या करनी चाही। पहली बार बच गया। पर दूसरी बार में सफल हो गया। वैदेही की कोई सूचना नहीं थी। इसलिए मैं वैदेही का हाल जानने के लिए उतावला रहता। खुलकर किसी से पूछ भी नहीं सकता था। लेकिन आज जैसे ही गाड़ी गुप्ता जी के घर के सामने पहुंची। मैंने ड्राइवर से पूछा ही लिया, भाई ये बताओ कि गुप्ता जी के परिवार के क्या हाल चाल हैं। वह बुझी सी आवाज में बोला ठीक ही हैं। मैं चुप हो गया। फिर कुछ देर बाद हिम्मत करके पूछा, गुप्ता जी के एक बेटी थी न, उसके क्या हाल चाल है। कहीं शादी बादी हो गई या अभी भी पढ़ लिख रही है। अब चालक ने झटके से मेरे ओर देखा। और कड़क आवाज में बोला क्या बाबूजी लड़की थी या बबाल, खुद तो बर्बाद हो ही गई। तीन परिवारों को और ले डूबी। उसकी करनी ने ऐसा ताडंव मचाया कि दो लड़के तो मारे ही गए। खुद भी पागल हो गई। अब परिवार वाले उसके पागलपन का इलाज कराते फिर रहे हैं। कभी नेपाल भेजते हैं, कभी आगरा और कभी दिल्ली। सुनते हैं अभी दिल्ली में ही है।
चालक ने गाड़ी वैदेही के घर के सामने रोक दी। बोलना जारी रखा और जो घटा, कह सुनाया। कस्बाई जिंदगी का जो सच उसके मुंह से सुना, मैं स्तब्ध रह गया।
उसने बताया कि अनिल और जीतेंद्र दोनों वैदेही के इश्क में पड़ गए थे। इनमें से अनिल वैदेही दोस्त था। और जीतेंद्र वैदेही का प्रेमी। अनिल, वैदेही और जीतेंद्र के मिलने का स्थान व समय तय करता। वह दोनों की हरसंभव मदद करता। दोनों के बीच की अहम कड़ी बन गया। और दोनों के लिए बेहद खास। अनिल ने वैदेही के भाई से भी अच्छी दोस्ती गांठ ली थी। और घर पर आना जाना शुरू कर दिया था। जीतेंद्र के प्रेम पत्र भी वही लिखता और वैदेही तक पहुंचाने का काम भी उसी के जिम्मे था। वैदेही जीतेंद्र के साथ अनिल से भी पूरी तरह से खुली गई थी। दोनों घंटों बात करते रहते।
फिर न जाने क्या हुआ कि अनिल और जीतेंद्र में बिगड़ने लगी। शायद जीतेंद्र को अनिल का वैदेही के बेहद करीब होना चुभने लगा था। और वह अनिल पर शक भी करने लगा था। जीतेंद्र के अन्य दोस्त भी पीठ पीछे उसके कान भरने लगे थे। इस बात से वैदेही और अनिल दोनों बेखबर थे। फिर एक दिन अनिल और जीतेंद्र के बीच जमकर मारपीट हुई। जीतेंद्र का भाई इलाके का गुंडा था। फिर एक दिन अनिल को वैदेही के घर के सामने ही चाकू मारकर कत्ल कर दिया। जीतेंद्र के भाई ने उसे मारवा दिया था। और तभी से फरार चल रहा है। वैदेही इस बात से बेहद दुखी हुई और जीतेंद्र से दूरी बनाने लगी।
जीतंेद्र का शक और भी बढ़ गया। वैदेही से मिलने की जिद पर अड़ गया और एक दिन उसके घर पहंुच गया। दोनों के प्यार की बात घर वालों को पता चल गई। घरवालों ने वैदेही की जमकर पिटाई की। और शादी करा देना मुनासिब समझा। कुछ दिनों में ही उसकी शादी पक्की कर दी। वैदेही शादी नहीं करना चाहती थी। उसने जीतेंद्र को सब बता दिया। और कहा कि अब हम नहीं मिल सकते। जीतेंद्र को सदमा लगा। वह वैदेही को नहीं खोना चाहता था। और वैदेही से शादी करने की जिद करने लगा। वैदेही लोक लाज के डर से कोई बड़ा कदम नहीं उठा पा रही थी। अंत में जीतेंद्र ने जहर खाकर आत्महत्या करनी चाही। बच गया। लेकिन जब वैदेही को किसी भी सूरत में पाने की उम्मीद न रही तो फिर जहर खा लिया। और इस बार वह बच न सका। जीतेंद्र की मौत की खबर पाकर वैदेही एकदम टूट गई। और लगभग विक्षिप्त सी हो गई। कई महीनों उसने अन्न-जल छुआ तक नहीं। अपना प्यार खो जाने के बाद वह पत्थर की बुत बन कर रह गई। वह जीतेंद्र को नहीं भुला पाई। वैदेही की इस हालत में न तो शादी हो सकती है और न वह खुश रह सकती है। इसकारण घर वाले उसका इलाज कराते फिर रहे हैं।
कस्बाई जिंदगी की यह प्रेम कहानी सुनकर मेरा मन कचोट गया। आखिर तीन हंसती खेलती जिंदगियां स्वाहा हो गई। जीतेंद्र ने संकीर्ण दिमाग के चलते अपना दोस्त खो दिया। और वैदेही के परंपरावादी परिजनों ने जीतेंद्र से उसकी शादी न कर दोनों को जीते जी मार डाला। मैं ऐसे ही विचारों में खोया था कि अचानक वैदेही के घर के सामने एक चार पहिया गाड़ी आकर रूकी। गाड़ी से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति और एक जवान लड़का बाहर निकला। फिर दोनों ने गाड़ी का दरवाजा खोलकर एक लड़की को उसकी एक-एक बांह पकड़कर बाहर निकाला। तभी चालक ने ईशारा करते हुए कहा- यही है वैदेही। शायद दिल्ली से परिवार सहित वापस लौटी है। उसके पिता और भाई ने उसे पकड़ा है। और उसी गाड़ी से आए हैं जिससे आप आए हैं। मैं गौर से वैदेही की हालत देखने लगा। आज पहली बार वैदेही को निगाह भर के देखा है। लेकिन अफसोस वह पहली सी वैदेही नहीं रही। हंसती-खिलखिलाती और हमेशा पढ़ाई में अव्वल आने वाली वैदेही। जिसकी खातिर मैं जानबूझकर ट्यूशन पांच मिनट देरी से जाता था।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

परेशानी में है अखबार

राहुल कुमार

एक अखबार बेहद परेशान हैं। परेशानी ऐसी की उसकी जान निकल रही है। वह चिंतित है। व्याकुल है। और सोच में डूबा हुआ है। परेशानी से निजात पाने के लिए वह कई कथिक विशेषज्ञों, कुछ बांगडूओं और कुछ ऐरे गैरे नत्थूखैरोें से सलाह लेता फिर रहा हैै। बहस करा रहा है। और अपने सोलह पेज में से कभी पूरा पेज, कभी आधा और तो कभी चार, तीन, दो काॅलम में बहस का हिस्सा छाप रहा है। सामाजिक सरोकार ऐसा कि सभी पाठकों से राय भी ले रहा है। अपनी समस्या जगजाहिर कर रहा है। समस्या भी विकराल है। जो मानवजाति के इतिहास में पहली बार आ धमकी है। अखबार के गले की फांस बन बैठी है।

रोजाना की तरह ही 31 दिसंबर की शाम सूरज डूबेगा और 1 जनवरी की सुबह उदय होगा। प्रकृति के बंधे बंधाये नियम के मुताबिक। लेकिन यही पल अखबार को सासंत में डालने वाला बन गया है। वह तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर नए साल को क्या कहें। उसे ट्वेंटी टेन से नवाजें, टू थाउजेंट टेन कहें या फिर टू टेन पुकारें। उसके रिपोर्टर कैंपस मंे स्टूडेंट को पकड़ रहे हैं। जो मिल जाता है चढ़ बैठतेे हैं और पूछ लेते हैं। नए साल को क्या कहें। लेकिन कमबक्त परेशानी है कि जाने का नाम नहीं ले रही। और इस तिलिस्म भरी समस्या से जूझने वाला अखबार कोई और नहीं, खुद को देश की राजधानी का सबसे लोकप्रिय कहने वाला पत्र है।

अखबार की इस गंभीरता पर अपुन कायल हो गए। देख रहे हैं कि जैसे वह समस्या के निदान के लिए अखबार का भरपूर स्पेस दे रहा है। जो स्पेस उसने कभी गरीब, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, बेरोजगारी व अन्य सामाजिक समस्याओं पर नहीं दिया। कभी इनके लिए युद्ध स्तर पर ऐसा अभियान नहीं छेड़ा। और आज भयानक समस्या दिखी तो वह कैसे चिंतित हो उठा। कैसे उसने अपने सबसे जिम्मेदार पत्र होेने की इत्तला कर दी। और कैसे समस्या का हल ढंूढ़ने के लिए विशेषज्ञों की चैपाल बिठा ली। आखिर राजधानी का सबसे बड़े अखबार होने का गौरव ऐसे ही थोड़े मिल जाता है। त्याग करना होता है। मुद्दों को समझने की पारखी नजर और उन पर सटीक जानकारी देने दी अद्भुत कला का धनी होना होता है। बेहद काबिले तारीफ है कि पत्र ने अन्य छुटपुट समस्याओं से पाठकों का ध्यान हटाकर इतिहास की सबसे बड़ी व विकराल समस्या की ओर कितनी कलात्मकता से ध्यान आकर्षित कर दिया। मुरीद न हो तो क्या हो।

खैर वो बात और कि अखबार की समस्या का हल हो भी जाए, लेकिन प्रकृति का असंतुलित होना रूकने वाला नहीं। हर छह बच्चों में भूख से मरने वाले उस एक बच्चे को भरपेट भोजन मिलने वाला नहीं। लोगों को कमजोर कर उनकी कमजोरियों को सियासी रंग देकर सत्ता पर काबिज होने की कायरता रूकने वाली नहीं। बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर सड़कों पर चप्पल चटकाते युवाओं को रोजगार मिलने वाला नहीं। बीसों साल से न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर काटते गरीब को न्याय नहीं। रोटी, मकान, सड़क, बिजली, पानी समस्याओं मंे कोई विकास नहीं। धर्म के नाम पर लूटने वाले मठाधीशों का बाल भी बांका नहीं। कई वादों में बिखरे देश को और नए वाद पैदा कर बांटने वालों पर कोई आंच नहीं। गुंडों और बाहूबलियों पर कोई अंकुश लगने वाला नहीं है। जब नये साल में कुछ भी नया होने वाला नहीं है तो क्यों न नये साल को नया नाम देकर ही मन भर लिया जाए। और नयेपन का अहसास कर लिया जाए। आखिर अन्य मुद्दांे के लिए क्या लड़ना। और इस शांतिप्रिय देश में लड़ने की बात भी क्या करना। जब अखबार की ये दूरदृष्टि समझ मंे आई तो खुद को कोसे बिना हम नहीं रह सके। कितने बेवजह के मुद्दों पर नजर गड़ाए बैठा रहता हूं। असल मुद्दा तो यहां था। जिस पर ध्यान ही नहीं गया। वो तो इस अखबार को भला हो। वरना दिल्लीवासी कहीं के नहीं रहते। अखबार की इस चिंता पर अगर सारी मीडिया गंभीर हो उठे तो कोई परेशानी ही न रहे।

पर वो बात दूसरी है कि नये साल का सूरज भी अपनी किरणों में किसी तरह की कोई तब्दीली करने वाला नहीं।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

नाइट क्लब में डांस पे चांस....

राहुल कुमार
लगातार आ रहे आॅफरों को कई बार ठुकराने के बाद, न जाने क्यों इस बार नाइट क्बल का रूख कर ही लिया। देखें तो भला रात की सुकून भरी नींद गवाने और उछले-कूदते, बांहों में बांहें डालने के पीछे लोगों का फलसफा क्या हैै। सो, दो साथियों के प्रवेश को एक फोन घुमाकर पक्का कर लिया। अकेले जाना मुनासिब न समझा। अपुन खांटी देसी आदमी, उस पर खराब मैनेजर। लेकिन अफसोस की बाकी दो भी अपुन जैसे ही। पर अच्छे मैनेजर। अब जाना है तो जाना है। मन बन गया है। और फिर तय कर दिया रात में मदहोश होती जवानियों के थिरकते कदमों से कदम मिलाने का समय। रात 11 बजे।
दोनों भाई लोग अपनी तरह अर्थशास्त्र में कमजोर। उम्र में बड़े। मुझसे खर्च भी नहीं करा सकते। एक की पगार हाल ही में मिली है। प्रवेश मुफ्त है। लेकिन पीने का खर्चा बहुत। पूरी पगार जेब में रख ली है। बहुत कुछ पीकर गए हैं। ताकी क्लब में और न पीना पड़े। लेकिन पीना तो पड़ेगी ही। रात जवान होगी और शराब उतरती-चढ़ती रहेगी। एक ने बहुत पी है। मैंने उससे कम और एक ने मुझसे भी कम। क्योंकि उसकी गर्लफ्रैंड का फोन आ जाता है। वह डरता है। अपनी अभी-अभी जुदा हो गई। टेंशन खत्म। पहले फोन आता था। तब पीते भी नहीं थे।
क्लब में जोड़े के साथ प्रवेश है। लेकिन अपनी चलती है। तीन का जोड़ा है। वो भी मस्ती में। भाईयों के साथ प्रवेश करते हैं। मुंबई से बैंड आया है। बहुत पाॅपुलर है। कानों में डीजे की धमक के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। सारा शरीर लगभग डीजे बन गया है। पूरा डांस फ्लोर थिरक रहा है। हम भी। सामने बार काउंटर है। जो भी पीना हो, पैसे दो और पिओ। पटियाला, टकीला, काॅकटेल, बीयर, बिस्की, रम, वोदका कुछ भी। लड़कियों के हाथों में बीयर की बोतल है। कुछ काउंटर पर टकीले पे टकीला पिये जा रही हैं। वोदका उन्हें खूब पसंद आ रही है। सब पुरुषों मित्रों के साथ हैं। बांहों में बांहे और लगभग सांसो में सांसे डाले हुए। चेहरे से खानदानी कम, रहीस ज्यादा हैं। बहुत कुछ पहना है फिर भी बहुत कुछ दिख रहा हैै। भाई इशारा करता है। अपुन पहले से ही देख रहे हैं।
रात जैसे-जैसे बढ़ती है। हरकतें भी बढ़ती जा रही हैं। पहले महज डांस हो रहा था। लेकिन अब और भी बहुत कुछ। जिन्होंने क्बल में ही पी है, वह अब बहकने लगे हैं। इसलिए हरकतें भी बढ़ गई हंै। पास वाला जोड़ा परेशान है। लड़का बार-बार किस लेना चाहता है। लड़की चेहरा फेर लेती है। बांहों में बांहें हैं पर होंठ.....जाने दीजिये। वह नखरे कर रही है। शायद बाद में किस देगी। देना नहीं होता तो रात को क्लब में ही क्यों आती। खैर।
भाई लोग पूरी बाराती स्टाइल में फ्लोर पर हाथ-पैर फड़फड़ाने लगे हैं। अपुन को थोड़ा बहुत थिरकना आता है। फ्लोर पर भीड़ बहुत है। सब नशे में चूर हैं। पता नहीं कौन किसके साथ आया है। जो मिलता है, उसी के साथ डांस पर चांस मारा जा रहा है। कौन कहेगा अपुन बगैर गर्लफ्रैंड के आए हैं। आसपास कई गोपियां कमर मटका रही हैं। कई बार स्पर्श का आनंद भी मिल जाता है।
करीब एक घंटे बाद एक जोड़ा थक पर सोफे पर लेट जाता है। अपनी पार्टी भी थक गई है। सोफे पर बैठने पहुंच जाते हैं। अंधेरा काफी है। फ्लोर पर चमक रही लाल पीली बत्ती से कुछ कुछ दिखता है। देखकर लगा शायद अब रात पूरी तरह जवान हुई है। कई जोड़े हैं वहां। पर हम वहां से निकल लेते हैं। कुर्सियों पर बैठ जाते हैं। भाई सिगरेट का पूरा पैकेट लेकर आया है। सुलगा लेते हैं।
कुछ सुस्ताते हैं। भाई इशारा करता है। क्योंकि कान मुंह के कितने भी पास हो आवाज सुनाई नहीं दे रही है। तीन लड़कियां हमारी तरह अकेली खड़ी हैं। शायद पार्टनर की तलाश में हैं। दोस्त आॅफर करने की बात करता है। अपुन को डर लगता है। साफ इंकार कर देते हैं। वह कुछ पास आतीं हैं। मुस्कुराती हैं। कुर्सियों पर बैठ जाती हैं। उनके हाथ में भी सिगरेट हैं। भाई डांस पर चांस मारने का चांस उन्हें देता है। वह राजी हो जाती हैं। मस्ती दुगुनी हो चली है। भाई वेस्ट आॅफ लक वाला अंगूठा दिखाता है। अब अपुन भी एक के साथ फ्लोर पर पहुंच जाते हैं।
कदमों के साथ कदम मिल गए हैं। मुझे घबराहट है। वह बिंदास है। मैं उसके कान में चिल्लाता हूं हाॅस्टल मंे रहती हो क्या ? वह डांस करते करते सिर हिला देती है। तभी जादू है नशा है..... बज उठता है। वह करीब आ जाती है। कब उसका हाथ मेरी कमर में आ जाता है पता नहीं। और मेरा भी। यह भी पता नहीं। सोणी केे नखरे सोणे लगदे.... बजते ही वह दूर हो गई है। पूरे जोश के साथ नाचने लगी है। अपुन फ्लोर छोड़कर कुर्सियों पर आ बैठते हैं। भाई लोग मस्त हैं। मेरा ख्याल उन्हें अब नहीं है।मैं उन्हें बुलाता हूं। और उपर वाले फ्लोर पर जाने के लिए कहता हूं। तीनों जाते हैं लेकिन बड़े कद वाला बाउंसर खड़ा है। वह रोक देता है। कहता है उपर कुछ नहीं है। जाना मना है। डांस नीचे ही करो। हम नादान नहीं हैं। जानते हैं उपर क्या है पर जाना भी नहीं चाहते। क्योंकि यह सब जानते हैं।
मन पूरी तरह उब चुका है। दम घुटने लगा है। ज्यादातर जोड़ियां थक कर बैठ गई हैं। कुछ लेट गए हंै। फ्लोर पर एक्का दुक्का ही बचे हैं। रात के तीन बज चुके हैं। अपना अब वापस चलने का मन है। तीनों राजी भी हैं। साथ वाली लड़कियां कहां गई पता नहीं। शायद किसी और के साथ हो गई होगी। लेकिन उनकी इस फितरत का बुरा नहीं लगता। जैसा कि उसका......खैर जाने दीजिये।
वापसी बेहद भारी है। दिमाग फट रहा है। लुत्फ क्या मिला पता नहीं लेकिन रात व्यर्थ जाने का दुख है। शुक्र है आने वाला दिन रविवार है। और काम कम है।
गाड़ी स्टार्ट करने से पहले दोस्तों से कहता हूं। यह क्या रिश्ता था। बांहों में बांहें थी और साथ में डांस। कुछ पल बेहद करीब। लेकिन अब कुछ नहीं। जैसे न अपने होने का कोई स्वाभिमान, न कोई अस्तित्व और न किसी तरह की कोई भावना। एक पल साथ और दूसरे पल में कोई नाता नहीं। तभी दोस्त चपत मारता है। ठीक वैसे जैसे किसी बेवकूफ को मारी जाती है। वह कहता है यह तो एक रात का साथ था। लोग सालों का छोड़ जाते हैं। तभी उसका ख्याल आता है। फिर कहता हूं। तो क्या अंतर है, इस रिश्ते में और उस रिश्ते में जो सालों रहा। दोनों रिश्तों का नतीजा एक है तो फितरत भी एक सी ही होगी। दोस्त हामी भर देता है। और कहता है कोई अंतर नहीं। सब एक है। लेकिन मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं है। कम से कम अपनी जानिब तो बिलकुल नहीं।
रात भर नाचने के बाद भी मन बेहद उदास है। तभी दोस्त कहता है पगार में से साढ़े तीन हजार का बट्टा लग गया। मैं मन ही मन कसम खाता हूं। आज के बाद न नाइट क्लब और न ही शराब।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

अय्यार दुनिया

राहुल कुमार
दरीचे में रखी ये बेढंगी किताबें
आज सुबह से ही मुंह चिढ़ा रही हैं मुझे
इनमें जो लिखा है इनसे जो पढ़ा है
कुछ भी तो नहीं है इस अय्यार दुनिया में
आसूदगी की बातें, नेकियत की दुहाई
इंसानियत के किस्से, उसूलों की कसमें
जैसे बोझ सी जान पड़ती हैं मुझे
अक्लबानों की ये बातें, कमअक्लों के लिए
पांवों में पड़ी जंजीर के सिवा कुछ भी तो नहीं है
कितनी झूठी और मक्कार लगने लगी हैं किताबें
जो खींच ले जाती हैं, ऐसे स्याह जहां में
जो कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं
और हम ढूंढ़ते रहते हैं, ताउम्र
एक बेहतर कल की आस में
जिसे ख्याबों में आना है, हकीकत में नहीं
फिर सोचता हूं, उस शख्स के बारे में
जिसने बना दिया है मुझे ऐसा
जिसने दी है ये दृष्टि
जो जेहन में छुपा बैठा है
और कचोटता है मन को
रह रह कर आता है याद मुझको
लाख कोशिश करता हंू फिर भी बेबस हूं
आंख के कोने में आए आंसू की तरह
उसका ख्याल जाता क्यों नहीं।

रविवार, 15 नवंबर 2009

नाम मेरे नाम से


राहुल कुमार

जुड़ गया फिर नाम उसका, नाम मेरे नाम से
लोगों ने महफिल सजा ली, नित नए इल्जाम से

कौन है ऐसा जो समझा उसके मेरे बीच की
सोच कर दिन भर के बाद, आंख नम है शाम से

चल गए कांटों पे गर, इश्क को समझेंगे तब
प्यार पर तोहमत लगाते जो बड़े आराम से

इश्क ही शै है यहां और बात है जज्बात की
आदमी भी देवता बन जाता है इस काम से

धड़कनें उसकी धड़कती आज फिर दिल में मेरे
उसने कुछ ऐसा कहा है अपने नए पैगाम से

दिल के नाते दिल के रिश्ते निभते हैं कैसे यहां
उससे पूछो मुझसे पूछो या फिर पूछो राम से

बातों में उनकी हम न हो

राहुल कुमार
जिक्र उनका जब भी हो, बातों में उनकी हम न हो
ये तो ऐसे हो गया कि जिन्दगी हो गम न हो

याद जब भी हम करें और हिचकियां उनको न हो
ये तो ऐसे हो गया कि साज हो सरगम न हो

नाम मेरा लेती हो, और दांतों मंे अंगुली न हो
ये तो ऐसे हो गया साथी हो हमदम न हो

ख्याब मेरी आंखों में हो और तस्व्वुर उनका न हो
ये तो ऐसे हो गया कि जख्म हो मरहम न हो

जब भी हमसे रूठते हो, रात भर जगते न हो
ये तो ऐसे हो गया कि आंख हो पर नम हो

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

गुंडांे से नहीं हारेगी हिन्दी

राहुल कुमार
राज ठाकरे के गुंडों का तमाचा हिंदी पर नहीं लोकतंत्र पर ज्यादा है। ओछी राजनीति व टुच्ची गुडंई करने वाले ठाकरे की इतनी औकात नहीं कि वह हिंदी की बिसात को ललकारे सके। उसने आकाश की ओर थूंका है मंुह पर ही गिरेगा। विधायिका में उसकी पार्टी का दुस्साहस संविधान की अवहेलना व देश चलाने वाले अगुआ बने नेताओं व कानून व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों के ढुलमुल रवैये की देने है। वरना हिंदी भाषी छात्रों के साथ दुव्र्यवहार के बाद ही सरकार राज ठाकरे के पंख क्यों नहीं कतरे गए। क्यों वोट बैंक की राजनीति के चलते राष्ट्रभाषा का अपमान किया व सहा जा रहा है। बात महज भाषा की नहीं उसके दुस्साहस और कारगुजारियों की है। जिसने अब हदें लांघ दी हैं।
जिस हिंदी की छाती पर चढ़ राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाना चाहता है वह उसकी ताकत से बेखबर है। चंद छात्रों के साथ मारपीट कर लेेने भर से अगर वह समझ रहा है कि हिंदी की गलेबान भी पकड़ लेगा तो भूल में है। जिस हिंदी को एक हजार वर्षांे की गुलामी खाक न कर सकी उसे 12 विधायक लिए ठाकरे क्या आंच पहुंचाएंगे।
यह वही हिंदी है जिसने भारत का स्वतंत्रता संग्राम अपने बलबूते लड़ा। वही हिंदी जिसके गीत गाते गाते शहादतें क्रांतिकारी हंसते हंसते दे गए। वही हिंदी जिसके अक्षरों के प्रेम से करोड़ों हिन्दुस्तानी एक होकर ललकार उठे और अंग्रेजों को बोरिया बिस्तर बांधकर जाना पड़ा। जिसका सूरज कभी अस्त नहीं होता था उस ग्लोबल अंग्रेजी को मुंह की खानी पड़ी।ये वही हिंदी है जिसने मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अब्दाली तक के तुफानी आक्रमण सहे। जिसने अरबी, फारसी, मुगल, फ्रैंच, पुर्तगाली और अंग्रेजी भाषाओं से लोहा लिया। वह भी तक जब इन भाषाओं के रखवाले देश की सत्ता पर काबिज हो गए थे और कुछ होने की लड़ाई लड़ रहे थे। हर हिंदी भाषी पर जमकर अत्याचार कर रहे थे।
फिर यह वही हिंदी तो है जिसने प्रेमचंद, अज्ञेय, जैसे कथाकार व मैथलीशरण गुप्त जैसा राष्ट्रकवि, मीरा का प्रेमलाप और कबीर सा दर्शन अपने अक्षरों से दिया। यह वही हिंदी है जिसमें गुलजार ने प्रेम के गीत रचे, निदा फाजली ने गजलें गढ़ी और जावेद अख्तर धड़कनों तक पहुंच रहे हैं। वही हिंदी जिसने अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक बना दिया। जिसने सारी दुनिया की मां मदर टेरसा को भारत बुला लिया।
हिंदी दिल और जुबान ही नहीं लहू भी है। जो खौलता भी है। जिसमें करोड़ों हिंदुस्तानियों के सपने हैं और जब इन्हें आघात लगेगा तो कोई गुंडा या दुस्साहसी टिकेगा नहीं। जब तक चुप्पी सधी है सधी है। खमोशी टूटेगी तो नमोनिशान न होगा। क्योंकि हिंदी हिंदी है। हिंदुस्तानियों का दिल। धड़कन और जीवन। और ठाकरे भी खूब जानता है तभी तो महाराष्ट्र की चाहरदीवारी मंे बयानबाजी व हरकतें करता है। कभी लखनउ, भोपाल या पटना आकर दिखाए। हिंदी गुंडई भूला देगी।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

और जुदा हो गया बगावती स्वर

राहुल कुमार
प्रभास जी से अपनी मुलाकात की बात सुनकर मैं बेहद उत्साहित था। इससे पहले उन्हें गोष्ठियांे में वक्तव्य देते सुना व देखा था। लेकिन एक कमरे में इत्मीनान से घंटे भर की बातचीत होगी, जितना चाहूंगा बतिया पाउंगा जैसा मौका हाथ लगने की सोचकर में लंबी लंबी डगें भर सड़क पर लगभग दौड़ सा रहा था। सन 2007, अगस्त माह की गर्मी थी। बरसात मुंह चिढ़ा रही थी। और दोपहरी के तीन बजे उनने मिलने का समय मिला था। प्रभास जी ग्वालियर के तनासेन होटल में ठहरे थे। मेरे गुरु आशीष द्विवेदी का जी फोन आया था और मेरी जनसत्ता में इंटर्न की बात भी करने बात भी कही थी।
मेरी सांस फूल रही थी, कुछ पैदल जल्दी जल्दी डगें बढ़ाने से तो कुछ पत्रकारिता के पितामह से मिलने की बात सुनकर। कैसे मिलूंगा ? क्या बात कंरूगा दिमाग मंे कई सवाल कौंद रहे थे। खैर में होटल में पहुंचा और जैसे ही उनके कमरे में दाखिल हुआ वह अपनी धोती बांध रहे थे। नईदुनिया के पत्रकार राजदेव पांडे, नरेंद्र कुईंया व गुरु आशीष द्विवेदी मौजूद थे। मैंने प्रभास जी के चरण स्पर्श किए और सामने बैठ गया। वह नईदुनिया के लिए साक्षात्कार दे रहे थेे। बात पत्रकारिता के कई आयामों पर हुई। प्रभास जी ने हर पहलू पर अपने विचार दिए। और अंत में मुस्कुराते हुए कहा कि छापना वही जो कह रहा हूं। आजकल कुछ कहो और पत्रकार कुछ छाप रहे हैं। अपने हिसाब से कुछ भी लिख रहे हैं। प्रभास जी का धोती पहनना जारी थी। लंबी सफेद धोती खुद धीरे धीरे बांध रहे थे। और पत्रकारिता के गुर सिखाते जा रहे थे।
प्रभास जी ने बताया कि कैसे उन्होंने हाथों पर लिख लिखकर रिपोर्टिंग की। राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते और राहुल सांस्कृत्यान के करीब रहकर क्या क्या खास सीखा। जनसत्ता का प्रयोग कैस सफल बनाया और पत्रकारिता में क्या कुछ बेहतर किया जा सकता है। वह कह रहे थे कि वह अब घूम-घूमकर यही पता लगाना चाहते हैं कि जो नई पीढ़ी पत्रकारिता में आ रही हैं कैसी है। उनमें कहा सुधार की गुंजाइश है और कहा वह पुरानी पीढ़ी से मजबूत है। वह कह रहे थे कि जगह जगह यात्राएं कर वह पत्रकारिता मंे आ रही बुराईंयों को दूर करना चाहते हंै। ताकी यह धर्म व सरोकारों की दुनिया सदा ऐसी ही बनी रहे।
उनका पूरा जोर पत्रकारिता के तेवर और लेखनी पर था। जो उन्होंने जनसत्ता में अपने नायाब प्रयोगों से करके भी दिखाई। और एक ऐसा इतिहास रच गए। जो हमेशा याद किया जाएगा।
वो दिन है कि आज का दिन है। प्रभास जी का हर कहा शब्द कानों में है। लेकिन उस दिन की तरह उनकी चमकती आंखे और होठों पर तैरती मुस्कान खो गई। आज सुबह जनसत्ता अपार्टमेंट पहुंचा तो वह शांत और निश्चिंत लेटे हैं। फूलों से सजे और सफेद चादर में लिपटे। एक युग आज एक ताबूत में बंद हो गया। प्रभास जी चले गए संसार छोड़कर। लेकिन वो सब कुछ दे गए जो हमें आगे की राह दिखाता रहेगा। बगावती तेवर, बुराई के खिलाफ डटकर खड़े रहने की हिम्मत, अंतिम सांस तक लड़ने की जिजीविषा, अडिग चट्टान सी विचारों की मजबूती और सत्ता के खिलाफ खड़े रहकर जनता को सत्ता मानने का स्वाभाविक गुण।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

खबर का खौफ

राहुल कुमार
वह आठ साल की लड़की थी। पर उसने बात ऐसी कह दी कि मैं अचरज में पड़ गया और बहुत देर तक सोचता रहा। उसकी बात सुनकर लगा कि क्या ये बातें नामचीन संपादक, अखबार मालिक नहीं सोच पाते। आखिर उस लड़की के दिमाग में ऐसी बातें कैसे पनपीं, जो संपादकों के दिमाग में नहीं उपज पातीं।
बड़े दिनों बाद अखबारी काम काज से दो दिन की छुट्टी मिली। खुशी-खुशी मैं अपने गांव की ओर रवाना हो गया। रास्ते में ही बुआ का गांव पड़ता है। मध्य प्रदेश के दतिया शहर से करीब सात किलोमीटर दूर। लरायटा गांव। एक अरसा बीत गया था उन सबसे मिले। सो पहुंच गया। सबसे मिला। सब बैठ कर बतिया रहे थे कि अचानक छोटी बहन ने कहा भईया आप पत्रकार हैं! वही पत्रकार जो तीन खबर झूठी लिखते हैं और एक सच। जो पैसा मांगते फिरते हैं। मैं अंदर तक कांप गया। जिस गांव में रास्ता आज भी कच्चा हो, बिजली एक घंटे आती हो, स्कूल पांचवी तक हो और जहां अखबार जैसी चीज बामुश्किल ही पहुंचती हो, उस गांव की छोटी सी बच्ची के दिमाग में यह सच कैसे उपजा ? क्षेत्रीय स्तर पर पत्रकारिता की यह छवि किस तरह बन रही है। और उसकी सोच ऐसी क्यों बनी ? मैंने पूछा, तुमसे किसने कहा। उसने बताया, पड़ोस में पुलिस वाले रहते हंै उन्होंने। आगे बुआ ने कमान संभाल ली, कहने लगीं उनसे पत्रकार पैसे मांगते हैं। हर महीने 15-20 हजार रुपए। पुलिस से पत्रकारों का पैसा बंधा है। नहीं देने पर गलत खबरें छाप देते हैं। छोटे-छोटे अखबार ही नहीं, बड़े अखबारों का भी यही हाल है। मैं हिल गया। पैसा बंधे होने की बात से नहीं बल्कि आम लोगों में पत्रकारिता की गिरती छवि के बारे में सोचकर।
सोचता हूं, दिल्ली-एनसीआर की पत्रकारिता से इतर संपादक क्षेत्रीय स्तर पर कितना ध्यान देते हैं ? पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए कौन जिम्मेदार है ? नामचीन संपादकों और मालिकों को धंधा बनती पत्रकारिता दिखाई क्यों नहीं देती। प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी अखबारों ने क्षेत्रीय स्तर पर अपने संस्करण शुरू कर दिए हैं। लगातार बढ़ रहे हैं। व्यापक फैलाव की चाहत सभी को हो चली है। आगे बढ़ने की होड़ का आलम यह है कि अनचाही खबरें भी छापी जा रही हैं। पेज भरने की विवशता ने कई अनचाहे समाजसेवी और नेता पैदा कर दिए हैं। जिनका समाज से कोई सरोकार नहीं है और रोज अखबार में छपते हैं। फोटो के साथ कई काॅलम में। छपास के रोगी पैदा कर दिए हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे पर भी अनाप-शनाप बयान जारी कर देते हैं। कोई मुद्दा नहीं मिला तो क्रिकेट इंडिया जीती, नहीं जीती तो हाॅकी हारी आदि ऐसे कई मौकों को भुनाते हैं। कांग्रेस के राहुल गांधी के जन्मदिन पर मिठाइयां बंटीं, किसी भी बयान पर पुतला फंूक डाला और बड़े से फोटों के साथ छप गए। कभी-कभार पत्रकारों को छापने का मूल्य भी चुकाते हैं। कभी गिफ्ट के रूप में तो कभी सीधे पैसा देकर। प्रेस कांफ्रेस में रिपोटरों को दिए ट्रीटमेंट से तय होता है कि खबर कितनी बड़ी जाएगी। अच्छा खाना खिलाया तो डीसी बन गई। दारू पिला दी तो तीन से चार काॅलम और कुछ नहीं किया तो संक्षेप में सिमट जाती है।
आखिर पत्रकारिता के इस स्तर की जिम्मेदारी कौन लेगा। अखबार के मालिक, संपादक या रिपोर्टर। सवाल यह भी उठता है कि क्षेत्रीय पत्रकारों और संपादकों के बीच संवाद कितना है। कौन सा संपादक क्षेत्रीय स्तर पर जाकर पत्रकारों से सीधे मिलता है। उन्हें संस्थान से जुड़े होने का अहसास कराता है। पत्रकारिता की गुणवत्ता पर बात करता है। सिखाता है। उनके सुख दुख का साथी बनता है। और क्षेत्रीय संपादकों के इतर कितने अन्य कर्मचारियों के नाम उन्हें मुंह जबानी याद हैं। गुणवत्ता के गिरते स्तर पर कौन संपादक बात करता है। उनसे पूछता है, उनकी पेज भरने की विवशता। साथ ही एक दिन में पांच से आठ खबरें देने की विवशता के बाद उन्हें कितना वेतन देता है। कई संपादकों को तो यह भी नहीं पता होता कि क्षेत्रीय स्तर पर कितना पैसा दिया जा रहा है।हर छोटे शहरों की यही हालत है। बहुत से लोगों ने अधिकारियों, नेताओं को ब्लैकमेल करने के लिए ही अखबार निकालने शुरू कर दिए हैं। जमकर धंधेबाजी हो रही है।
पत्रकारिता के लिए बेहद अफ़सोस का दौर है। जब दूर-दराज के गांवों में पत्रकारिता की पहचान इस रूप में हो रही है तो शहरों के जागरूक पाठकों की नजर में क्या स्थिति होगी। और सबसे बड़ी बात उन रिपोर्टरों की क्या छवि होगी, जिनसे खबरों के दौरान वे मिलते हैं। यह दर्द संपादक और मालिक महसूस करते हांे, इसकी संभावना नहीं लगती। सारी संभावनाएं अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ाने की आपाधापी में गुम होती जा रही है। इस कड़वी सच्चाई से अखबार के मालिक, संपादक, रिपोर्टर भले ही नजरें चुराएं लेकिन एक आठ साल की बच्ची भी इसे बखूबी बयां कर देती है।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

खूब बिकी किशोरी वो तो नोएडा वाली आरूषि थी

राहुल कुमार
सिर्फ मरा हाथी ही सवा लाख का नहीं होता। यहां तो मासूम किशोरी आरूषि मरने के बाद मीडिया के लिए करोड़ों की साबित हुई है। धंधा बन चुकी और टीआरपी की गुलाम मीडिया ने जैसे चाहा आरूषि को वैसे बेचा। किसी ने पापा का पाप कहकर बेचा तो किसी ने पापा तूने क्यों मारा कहकर। किसी ने उसे मासूम करार दिया तो किसी ने आज की आधुनिक लड़की, जिसे माता पिता भी नहीं समझ सके। तरह तरह से। पचासों एंगल से उसे बेचा। बेवजह देश की सबसे बड़ी मिस्ट्री करार दिया। बेचने के कई तरीके खोजे। और जिस भाषा में, जिस दिमाग से बेचना चाहा, बेचा। इलेक्ट्राॅनिक ही नहीं प्रिंट ने भी बेचा। पूरा पूरा पेज बेचा। स्पेशल निकालकर। हर अखबार ने कम से कम तीन-तीन सौ बार आरूषि पर रिपोर्टें छापी। केस की हर हरकत पर अपने नजरिये से कुछ भी लिखा। मर्डर मिस्ट्री पर बांगडू से बांगडू रिपोटर्र की अपनी थ्योरी दी। जिसे वह अकाट सत्य मानकर जी रहा है। और दावा कर रहा है कि पुलिस या सीबीआई उस पर काम कर दे तो केस मिनटों मंे खुल जाए। छोटे से छोटा अखबार भी। बड़ी से बड़ी थ्योरियां दे रहा हैै। लगातार मर्जी से। क्योंकि आरूषि बिक रही है। और मीडिया ने उसे ऐसा बना दिया है। हाल ही के दिनों में आरूषि का जिन्न फिर जिन्दा हुआ है। पहले दिनों उसकी स्लाइट हैदराबाद में झूठी साबित हुई और अबकि उसका मोबाइल मिलने से हंडकंप मचा है। फिर सारी क्लिप बिकने लगी। फिर घंटो वाचक स्टूडियों मंे बकने लगे हैं। आरूषि आरूषि आरूषि। जिस रात मोबाइल मिलने की सूचना आई। कई चैनलों ने अपनी ओवी वैन खुर्जा भेज दी। रात भर मीडिया मैन धूमते रहे। प्रिंट को भी चैन नहीं। रातों रात लिख डाला। पिफर पुरानी पफाइलें काम आई। क्योंकि नया तो आरूषि फिर अखबारों के पहले पन्ने पर छपी और चैनलों पर घंटों दिखी।
सीबीआई ने छोड़ो तो मोबाइल वाली कुसुम को एक चैनल ने सुबह ही बिठा लिया। देखिए तमाशा सवाल पर सवाल। सवाल पांच मिनट में खत्म। वहीं सवाल फिर से। कुसुम उनका जवाब पांच पांच बार दे चुकी है। फिर से वही सवाल। आखिर समय खीचना है आरूषि बिक रही है और उसे बेचना है। कुसुम एक ही तरह सवालों को जवाब बार बार देे देकर खीझ रही है। लेकिन गरीब है। कुछ विरोध नहीं कर पा रही है। जो नहीं कहना चाहती चैनल उगलवाना चाहते हैं। कशमकस है।
अजीब है ये दुनिया। जहां सिर्फ छाने की हसरत लिए टीआरपी का बोलबाला है। गुलाम। जहां सोचने समझने की शक्ति का रास्ता सिर्फ विज्ञापन से होकर गुजराता है। जहां समाज और सरोेकार मर गए। मार दिए हैं। फिर भी दंभ है चैथे स्तंभ का। समाज को आईना दिखाने का। सोचता हूं अगर सच में आरूषि का भूत आकर उसे बेचने के तरीकों पर सवाल करे। या मानहानि का दावा करे तो मीडिया सलाखों के पीछे हो। बेचने की चाहत में कुसुम और रामभूले ने भी देश को, चैनलों के स्टूडियों के माध्यम से संबोधित कर डाला। आरूषि के प्रति आम लोगों में क्या है क्या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन मीडिया के लिए आरूषि इतिहास बन गई। मीडिया ने इतना बेचा की उसका हर रिपोर्टर और संस्थान का मालिक उसे हमेशा याद रखेेगा। और पंक्तियां दोहराएगा। खूब बिकी किशोरी वह तो नोएडा वाली आरूषि थी। अफसोस हर्ष के साथ।

सोमवार, 1 जून 2009

अगर नोट 1 हजार का होता तो.....

राहुल कुमार
अंदर तक हिला देने वाली और बहुत से मिथक तोड़ देने वाली इस घटना में शामिल होने का जितना मुझे दुख हैै उससे कहीं अधिक रोष। घटना के बाद में देर तक यही सोचता रहा कि अगर नोट 1 हजार को होता तो क्या ऐसे हालात बनते ? पत्रकार प्रेस कांफ्रंेस का बहिष्कार करके जाते या फिर चुपचाप अंटी में लिफाफा दबाकर लंच कर चल देते। पर इस वाकया से एक बात जरूर साफ हो गई कि पत्रकारिता की औकात नेताओं के नजर में क्या रह गई है। वह भी ऐसे टूच्चे नेताओं की नजर में जो एक जिले या प्रदेश की राजनीत करते हैं।
हुआ यूं कि 1 जून को उप्र महिला कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव जाहिरा जैदी ने नोएडा में प्रेस वार्ता की। प्रेस वार्ता का सारा जिम्मा कांग्रेस से लोकसभा के प्रत्याशी रहे रमेश चंद्र तोमर व अन्य कथित नेताआंे पर था। वार्ता में बड़ी बड़ी बातें कहकर, खुद को देशभक्त बताकर जैदी ने प्रेस रिलीज को लिफाफे में रखकर बांटना शुरू कर दिया। पत्रकारों ने जैसे ही लिफाफा खोला उसमें सौ का नोट भी निकला। जो निश्चित रूप से पत्रकारों को रिश्वत के तौर पर था। ताकी वार्ता का कवरेज बेहतर हो। लेकिन पत्रकारों ने सौ का नोट देखकर आपा खो दिया और वार्ता का बहिष्कार कर दिया। नेताओं के होश उड़ गए। मांफी मांगते फिरे और खूब मिन्नतें कीं। लेकिन कुछ पत्रकार मान गए कुछ चल दिए।
सोचता हूं कि आखिर इन कथित नेताओं के मन में पत्रकारों की औकात क्या रह गई है ? बताया गया कि किन्हीं दलाल पत्रकारों ने उनके शुभ चिंतक होेने और अच्छा कवरेज कराने की बात कहकर उन्हें यह सलाह दी थी कि लिफाफे में 100 रुपए रख कर दे देना। नेता अखबारों और चैनल के कार्यालय में फोन करते रहे और खुद पत्रकारों की सलाह पर ऐसा कृत्य करने की बात कहते रहे।
इस घटना के बाद से मैं बड़ा आहत हूं। पत्रकारिता को लेकर जो मिथक और सपने मैंने गढ़े थे उन्हें बड़ा धक्का लगा है। खासकर धक्का उस समय घाव बन गया जब नेताओं के खिलाफ खबर न छाप कर सीधे और सही रूप मंे लिखने की बात सामने आई। मैं सोच रहा था कि खबर मुख्य पृष्ठ पर जाएगी और जाहिरा जैदी की पत्रकारिता का अपमान करने की बात पर महासचिव के पद से छुट्टी हो जाएगी। अपने हाल ही में शुरू हुए पत्रकारिता जीवन में इसतरह का यह पहला मौका था। गंदी हो चुकी राजनीति का यह कार्य सहनशीलता से बाहर है। लेकिन पत्रकारों की यह औकात आखिर बनाई किसने है ? इतना बड़ा अपमान वहां मौजूद कुछ अखबारों के संपादक और बड़े रिपोर्टर हंसते हंसते सह गए। हां मेरी उम्र के कुछ नए पत्रकारों और फोटोग्राफर ने विरोध किया और नेताओं के बुलाने का पुरजोर आग्रह करने के बावजूद वापस नहीं गए।
पत्रकारिता का इसतरह से पतन देखकर मन अंदर से बहुत भारी हो गया। और लगा जैसे पत्रकारिता की धार पैसों ने कुंद कर दी। पिछले एक साल से नोएडा की पत्रकारिता की छवि देखकर अब महसूस करता हंू कि अगर नोट 1 हजार का होता तो क्या जो पत्रकार वापस आ गए या जो विरोध हुआ वह भी होता क्या ? चुनाव का मौका हो या फिर छोटा मोटा लाभ लेने की स्थिति खबरों से हमेशा ही तो समझौता होता है। लोकसभा चुनाव में पत्रकारों की हैसियत भी तो इसी बात से नापी गई थी कि किसने कितना पैसा पार्टियों से कमा पाया। जिनसे ज्यादा पाया वह ज्यादा बड़ा पत्रकार।
अफसोस बड़े पत्रकारों की सौदेबाजी में हम जैसे रिपोर्टर की इज्जत हर कदम पर जार जार होती है। टूच्चे नेताओं में 100 रुपए देने का साहस तभी आया जब बड़े पत्रकार बड़े नेताओं से करोड़ों का सौदा करते हैं। अकसर पत्रकारिता को वैश्या कहे जाने का रिवाज खुर्शियों में आता रहा है लेकिन कुछ दलालों ने इसे वैश्या से भी गया गुजरा बनाकर छिनाल का रूप दे दिया है। क्योंकि वैश्या तो मजबूरी में पेट पालने के लिए जिस्म का सौदा करती है। पर छिनाल अपने आनंद के लिए कई लोगों के साथ हमबिस्तर होने में सुकून पाती है। ऐसी ही हालत पत्रकारिता की होती जा रही है। जो अलग अलग लोगों के फायदे के लिए धनाढ्यों की रखैल बनकर रह गई है। पैसा दो कुछ भी छपवा लो, रात को पत्रकारों को दारू पिलाओ और कुछ भी छपवा लो।
लेकिन पत्रकारिता का यह रूप कितने समय तक उसे जीवित रख सकता है। यह वाकया जरूर एक जिले का हो लेकिन यह हालत बड़े स्तर पर और भी भयावह है। पत्रकारिता के मायने खो गए हैं। एसी और लग्जरी गाड़ियों में सफर करने वाले संपादक अभी भी सावधान नहीं हैं। राज्यसभा में जाने का सपना संजोये बैठे यह संपादक आखिर इस सौ रुपए की जलालत को नहीं झेल रहे हैं। वह इस बात में फूले नहीं समाते कि अमुख नेता से उनके अच्छे संबंध हैं। मेरा नेताओं को दोष देने का मन कतई नहीं हो रहा है। क्योंकि बिकाउ तो हमारी ही बिरादरी हो गई है। और जो चीज बिकाउ हो उसे कौन नहीं खरीदना चाहता है। पैसा है तो खरीद रहे हैं। लेकिन दुख इस बात है कि बाहर से बेहतर छवि परोसने वाली पत्रकारिता किस स्तर तक गिर गई है। और ऐसे ही हालात रहे तो और किस स्तर तक गिरेगी....?

मंगलवार, 19 मई 2009

काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती

राहुल कुमार
वाकई बहुत बेशरम हैं। लानत है इन नेताओं पर जो जनता के धिक्कारने के बाद भी अपनी खुदगर्जी से बाज नहीं आ रहे हैं। मुंह की खाने के बाद भी बांगडू बांग दे रहे हैं। समर्थन ले लो समर्थन। अरे भाई काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। जनता बेवकूफ नहीं है। समझ गई हरामखोरी को। निकाल फेंका न मक्खी के तरह राजनीति से। अलगाव और अफसरवादिता की राजनीति की हांडी जलाकर राख ही कर दी। अब रोये पांच साल तक। बहा लो टेसू साइकिल, लालटेन, हाथी और झोपड़ी के नाम पर। कमल भी मुरझा गया। आखिर कब तक गोधरा और बाबरी मस्जिद की त्रासदी झेलेगी जनता। अब दंगे नहीं, शांति और तरक्की चाहिए भाई। तरक्की। चैन से रहने के लिए।
मुलायम, लालू और पासवान अब फड़फड़ा रहे हैं राजनीति में जीवित रहने के लिए। सबसे ज्यादा लालू। पिछले दो दशक में ऐसा पहले बार होगा कि वह सत्ता से बेदखल गुमनामी में जीने को मजबूर होंगे। मुलायम की लुटिया भी हिचकोले खा रही है कब डूब जाए कयास तेज हैं। वहीं पासवान पिघल गए जनता के अक्रोश की आंच में। खुद की सीट भी नहीं बचा पाए दलितों के मसीहा। देर से जरूर पर ठीक हुआ जनता को भेड़ समझने वाले इन नेताओं के साथ। आखिर बहुत खेल खेल लिया था दोस्ती और दुश्मनी का। अबकी भेड़ की तरह नहीं हंकी जनता। विधानसभा में कट्टर दुश्मन और लोकसभा में भाईगिरी नहीं चली। जनता ने सबक दे ही दिया या तो दोस्त रहो या दुश्मन। मनमर्जी नहीं चलेगी। मतदाता बेवकूफ नहीं है कि हर बार इशारों पर नाचे। अहम तोड़ दिया। और ऐसा तोड़ा कि संभलना मुश्किल है।
वहीं उप्र को खुद की बफौती समझने वाली कुंवारी बहन जी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोय बैठी थीं। खूब ताल ठांेक रही थी। 21 सीट ही ले सकी। सुंदर सपना टूट गया। जातिवाद नहीं चला। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाए के समीकरण भी ध्वस्त हो गए। हालत ये हो गई है इन सपनों के प्रधानमंत्रियों की कि यूपीए को बिन मांगे समर्थ देने को लालायित हैं। समर्थन आलू, बैंगन टमाटर हो गया है। ले ले बिना शर्त के। अंदर से बाहर से बस ले ले। ताकी बचे रहें। गुजर बसर होती रहे।
याद हो यह वहीं नेता हैं जो महीने पर पहले बहुमत में आई पार्टी को बिना कंठ गीला किया कोसते थे। दावा करते थे उनके बगैर देश को प्रधानमंत्री नहीं मिल सकता। और अब तेवर कैसे बदल गए। बांगडूओं को शर्म तक नहीं आ रही। मीडिया पुराने बयान और वीडियो पर सवाल दाग रही है। पर वह बस समर्थन देने की बात पर टिके हैं। यूपीए नहीं ले रही है। न उसे चाहिए। पर जबर्रदस्ती दे रहे हैं। जनादेश को वाकई सलाम करने का मन है आज। दिखा दिया काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती।

गुरुवार, 7 मई 2009

पप्पू एक छलावा और नेताओं का पाप है

राहुल कुमार
चंद स्वार्थी और खुद को दूसरे से ज्यादा जागरूक समझने वाले कथित लोगों ने वोट की ऐसी लहर चलाई कि पप्पू शब्द ही घृणित कर दिया। हर तरफ पप्पू न बनने की गूंज है। पप्पू मत बनिए वोट डालिए। आपका वोट सरकार बदल सकता है। लोकतंत्र में भागीदार बनो आदि इत्यादि। जैसे आप पप्पू बन गए तो इस धरती पर रहने के काबिल ही नहीं है। पप्पू होना दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है। सरकार से लेकर खबरिया चैनल, बकबक करने वाले एफएम और पत्र-पत्रिकाएं पप्पू न बनने का दबाव डाल रही हैं। इस सारी मुहिम में पप्पू नाम वालों का क्या हुआ होगा मैं नहीं जानता पर यह जरूर समझ सकता हूं कि यह पप्पू साधारण नहीं है। बड़ी चाल है। और इसके पीछे वही गंदी राजनीति जान पड़ रही है।
जानता हूं कि वोट देना हक है और हर व्यक्ति को वोट देना चाहिए। लेकिन जिस तरह मतदाताओं पर जबर्दस्त दबाव बनाया जा रहा है वह पच नहीं रहा है। वोट लेने के लिए नेताओं ने पूरा प्रोपेगंडा रच डाला हैं। पप्पू कह कह कर मतदाता को इतना जलील करने की मुहिम चला दी है कि वह पप्पू शब्द से घृणा करने लगा है और इसी डर से की कहीं वह घृणित प्राणी न हो जाए वोट डालने जा रहा है। इसमें जागरूक करने की कौन सी बात है? यह तो सरासर डराना और धमकाना है। जिसमें सरकार से लेकर मीडिया तक शामिल है।
आखिर समझ नहीं आता यह पप्पू पप्पू क्या है। हर खास बनने की ललक वाला लंपट प्राणी पप्पू के नाम को भुना रहा है। जो भी चार पत्रकारों की प्रेस वार्ता का खर्चा उठाने में सक्षम है वह पप्पू का मसीहा बन बैठा है। वह मीडिया से जरिये अपील कर रहा है कि पप्पू मत बनिए। वोट देने वाले को वह दवाईयां मुफ्त देंगे। मुफत में बूट पोलिश करेंगे, मनोरंजन पार्काें और मल्टीप्लेक्स में छूट देंगे, बस वोट डालने जाओ। उनकी बात मानों क्योंकि वह अपील कर रहे हैं और अपील करने की उनकी हैसियत है। यह वही छपास के रोगी हैं जो मीडिया पर कुछ खर्च कर चमकने की लालसा रखते हैं और कामयाब भी होते हैं। इन सालों से पूछा जाए कि इनके घर के सदस्य कितने वोट देते हैं तो आंकड़ा शून्य ही निकलेगा। और छूट देना किस मानसिकता को उगाजर करता है वह भी साफ हैै। क्योंकि अमीर आदमी तो छूट के लालच में आएगा नहीं। इसका मतलब वह समझते हैं - पप्पू गरीब मतदाता है जो छूट के लिए और बूथ पोलिश के लिए वोट डालने आ जाएगा।
अफसोस इस बात का है कि इस परिस्थिति के लिए भी आम जनता को ही दोषी ठहराया जा रहा है। जिसके पास पैसा है वह जागरूक करने वाला बन बैठा है। जागरूकता की परिभाषा तय करने का मानक क्या है ? किसी को वास्ता नहीं। साथ ही आहत इस लिए भी हूं कि मतदाता पर सब चढ़ बैठे हैं। आखिर यह हालात पैदा किसने किए ? ऐसा कौन सा नेता है जिसे अपना मत दिया जा सके। खैर आप कहेंगे कि पप्पू न बनने के लिए फाॅर्म नंबर 17 इस्तेमाल किया जा सकता है। पर क्या यह सवाल खड़ा नहीं होता कि पांच साल के लिए चुन लिए जाने वाले नेताओं के लिए ऐसी मुहिम क्यों नहीं चलाई जाती। क्यों सरकार ऐसे विज्ञापनों का इस्तेमाल उन नेताओं के लिए नहीं करती जो पांच साल सत्ता सुख भोगने के बाद भी विकास की उपलब्धियोें में शून्य होते हैं। आज तक क्यों नेताओं के पप्पू बनने की बात का प्रचार नहीं हुआ। मीडिया, सरकार और खुद को जागरूक कहने वाले कथिक समाज सुधारक घोटाले करने वाले भष्ट्र नेताओं के लिए आगे नहीं आए। क्यों जनता को ऐसे नेताओं के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए जागरूक नहीं किया जाता है। और जनता को ही क्यों जागरूक किया जाए, क्या भला वही सोई है। इन बांगडू नेताओं को जागरूक क्यों नहीं किया जाता। जो सत्ता में आते ही टमाटर की तरह लाल हो जाते हैं और आसमान छूती कोठियों का स्वामी बन बैठता है। पप्पू बनने के लिए क्या महज मतदाता ही है। यह साजिश के अलावा और कुछ नहीं। पप्पू एक छलावा है जो नेताओं का बनाया हुआ पाप है। अपने पाप को छुपाने के लिए सरकार ने यह पप्पू पैदा किया है और मतदाताओं को उलझा कर फिर से अपना उल्लू सीधा किया है।

मंगलवार, 5 मई 2009

पत्रकारिता पर रोने के लिए दुखड़ा बदलो

राहुल कुमार
पत्रकारित्रा के छात्र जीवन में जितने भी नाम चीन पत्रकार हमें लेक्चर देने विश्वविद्यालय आते ज्यादातर अपनी संघर्ष की कहानी सुनाते थे। और छात्र अधिकांशतः एक ही सवाल पूछते- पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन ? असल में मैं भी इस जाल में ऐसा फंस गया था कि हर संभव इसका जवाब ढूंढने की जुगत में लगा रहता। इसके अलावा छात्र जीवन के बाद अब नौकरी में दौरान भी गोष्ठी के नाम पर एकत्रित हुए बड़े पत्रकारों को भी एक दो विषयों से इतर बहस करते नहीं देखता हूं।
छात्र जीवन में ग्वालियर में कई गोष्ठियों में शामिल हुआ लेकिन मुद्दे हमेशा एक से ही पाए। पहला संपादक की सत्ता पर प्रबंधक का दवाब, दूसरा खबरों से ज्यादा विज्ञापन की बढ़ती अहमियत, और तीसरा भाषा का गिरता स्तर। जिसमें बड़े पत्रकारों का भाषा को लेकर रोना और सुधारने के लिए लंबी दुहाईयां और नए पत्रकारों को जमकर कोसना शामिल होता था। सौभाग्य से दिल्ली में भी एक गोष्ठी में शामिल होना का मौका जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार अमित प्रकाश जी के सहयोग से मिला। गोष्ठी का विषय था स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के जोखिम और चुनौतियां। जिसमें देश के बड़े अखबारी और खबरिया चैनलों के पत्रकारों ने अपने मत रखे। गोष्ठी में हिंदी निदेशालय के निदेशक और दिल्ली विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की प्रोफेसर भी शामिल थीं। इसके अलावा नवोदित पत्रकारों को भी बोलने का मौका दिया गया।
वक्तवों में भाषा, संपादक की सत्ता और विज्ञापन के प्रभाव जैसे मुद्दों के इर्द गिर्द ही सारी गोष्ठी के मत घूमते रहे। लेकिन पत्रकारिता की चुनौतियां और जोखिम और भी हैं। गोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ने अपना महिला होने का धर्म निभाते हुए मीडिया पर स्त्री देह को इस्तेमाल करने बात कही। यह मुद्दा मेरे लिए नया तो नहीं पर गोष्ठी में किसी महिला से पहली बार सुना था। सो नया लगा।सोचता हूं कि गोष्ठियांे के पास क्या इन मुद्दांे, विषयों के लिए की गई बहसों के अलावा कुछ और नहीं होता। पत्रकारिता में भाषा गिरी है पर है तो, वह भी जनमानस के हिसाब से तब्दीली के साथ पनपी है। संपादक की सत्ता प्रभावित हुई पर वह भी अस्त्तिव में है। संपादक नाम का प्राणी आज भी खबरों का मुखिया और जवाबदेह है। वहीं खबरों और विज्ञापन में दोनों का महत्तव बराबर है। और जब तक पत्रकारिता रहेगी दोनों की बराबर अहमियत बनी रहने की संभावनाएं हमेशा जीवित रहेंगी।
लेकिन पत्रकारिता जिस बात से सबसे ज्यादा पतित हो रही है उस मुद्दे को कोई छूता ही नहीं है। मैं समझता हूं कि इस विधा के बगैर पत्रकारिता पूरी तरह लुप्त हो जाएगी। जिसपर किसी का ध्यान नहीं है। खासकर इसके बगैर पत्रकारिता बेहद मुश्किल व गुणवत्ता के साथ बना रहना कठिन है। जिस संस्कार से ही देश के बढ़े पत्रकार आज नाम कमा चुके हैं। उन्हीं का ध्यान अब इस संस्कार पर नहीं है। मैं बात कर रहा हंू गुरू शिष्य परंपरा की। जो आज की पत्रकारिता में खो चुकी है। कथित बड़ा पत्रकार न्यूकमर को अपने गुर देेने से इतना डरता है कि कुछ पूछते ही पत्रकारिता में आने की बात को ही दुर्भाग्य कह उठता है। अगर मजे पत्रकार नवोदित पत्रकारों को गुर नहीं देंगे तो कैसे यह पेशा गुणवत्ता के साथ बना रह सकता है। सभी जानते हैं कि प्रभास जोशी बने तो राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर जैसे लोगों के बीच रहकर। साथ ही जनसत्ता जब अपने उफान पर था तो आज कई संस्थाओं के उच्च पदों पर बैठे बड़े पत्रकार यहीं पत्रकारिता के गुर सीखा करते थे। लुप्त हो चुके इस संस्कार से पत्रकारिता जरूर गलत दिशा में जा सकती है। गोष्ठियों में इस मुद्दे पर बहस करने वाले शायद ही मिले। लेकिन खुद को बुद्धिजीवी की श्रेणी में रखने के लिए वह संपादक की सत्ता और भाषा के गिरते स्तर पर खूब हिचकियां भरते हैं। महोदय पत्रकारिता पर रोने के लिए और भी खूब मुद्दे हैं। पर इसके लिए जरा यथार्थ पर आना होगा। समय पर और जरूरत के हिसाब का वेतन मिलना भी बड़ा मुद्दा है ?

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

ये जूता चलना चाहिए

राहुल कुमार
हालांकि गृहमंत्री पर जूता फेंकने के बाद जनरैल ने अपनी गलती मानते हुए कहा कि उनका विरोध करने का तरीका गलत था। वह भावनाओं में बह गए थे। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वाकई एक पत्रकार का धर्म यह नहीं है। उसे कलम को हथियार बनाकर अनीति के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन मानता हूं पत्रकार के इतर जनरैल का कदम एकदम सही है। चुप्पी की दुनिया मिटाने के लिए ये जूता चलना ही चाहिए। खासकर हर उस जगह जहां अन्याय है। जहां तानाशाही चलती हो। जहां निज स्वार्थांे के चलते लोग विरोध करना भूल गए हैं और चुपचाप सब कुछ सह रहे हैं। जनरैल को ही ले लें। जब तक वह कांग्रेस की इस नीति के खिलापफ लिखते रहे क्या हुआ....? जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दे दिए गए। अगर जूता नहीं चलता तो वह चुनाव भी जीत जाते और मंत्री भी बना दिए जाते। ऐसी जगह कुछ अनुचित लोगों के साथ उचित न्याय हो गया तो जूता चलना क्या गलत है। बल्कि यह जूता हमारे देश में हर जगह चलाने की जरूरत दीखने लगी है। यह जूता वहां चलना चाहिए जहां सरपंच, कलेक्टर, विधायक, मंत्री ने लेकर सभी जिम्मेदार व्यक्ति आराम फरमा रहे हैं वहीं किसान दो जून की रोटी न कमा पाने और ऋण न चुका पाने की स्थिति में आत्महत्या करने को मजूबर हो रहे हैं। क्या यह जूता उन लोगों पर नहीं चलना चाहिए। क्या अभी शांति से बात कर व्यवस्था को सुधारने की कुछ योजनाएं लाने की जरूरत रह गई है। या फिर जूता चलाकर लापरवाहों को उनकी सही स्थिति दिखाने की नौबत आ गई। यह जूता हर उस बाहुबली पर चलना चाहिए जो दबंगई दिखाकर किसी दलित महिला के साथ......... यह जूता उस पुलिस व्यवस्था पर चलना चाहिए जिसकी गस्ती में चार गुंडे किसी भी लड़की को उठा ले जाते हैं। यह जूता वहां चलना चाहिए जहां एक शिक्षक को अपने ही फंड का पैसा निकालने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है। यह जूता वहां भी चलना चाहिए जहां जाति के नाम पर लोग विरोध कर रही टीम से अलग हो जाते हैं और वहां भी चलना चाहिए जहां छात्रों से मोटी फीस लेकर बैठने तक की जगह नहीं दी जाती। क्लास और जरूरी संसाधनों के लिए छात्रों को पढ़ाई छोड़कर सड़कों पर संघर्ष के लिए उतरना पड़ता है। आखिर यह जूता वहां क्यों नहीं चलना चाहिए जहां प्रतिभा को दबा कर सिफारिश को प्राथमिकता दे दी जाती है। जहां मंदिर, जाति और क्षेत्र के नाम पर गंदी राजनीति कर लोगों का बेघर कर दिया जाता है। जनरैल का जूता महज भावनात्मक प्रतिक्रिया हो, लेकिन संदेश देता है कि जूता चलाने का वक्त आ गया है। शांति से बैठना और गांधी नीति से व्यवस्था को सुधारने का वक्त खत्म हो चुका है। पाप का घड़ा इतना भर गया है कि गंाधी जी के सिद्धांतों को चलाना लाजमी न होगा। चुप्पी तोड़ दो दोस्त और हर अन्याय के सामने जूता लेकर खड़े दिखाई दो। देखना जो कायर व्यवस्था को दूूषित किए हुए हैं कैसे सुधरते हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2009

गांधी तेरे देश में गांधी बिगड़ गया

जी हां, इसमें नया कुछ नहीं है। वरूण का बयान महज सस्ती लोकप्रियता पाने और चुनावी राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं माना जा सकता। चुनाव से पहले ऐसा कुछ तो करना ही था जिससे वह मीडिया में छा सके। वरूण ने एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगल कर वही किया जो भाजपाई अब तक करते आए हैं। और फिर भाजपा की शैली भी तो यही है। अब भला क्यों बड़े भाजपाई वरूण बयान से पल्ला झाड़ रहे हैं। उमा भारती हो, प्रवीण तोगड़िया या फिर गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सबकी शैली एक सी है। कुछ हिंदू भड़काओ और वोट पाओ। पर अफसोस कुछ हिंदू इनकी गंदी राजनीति में अपना सुरक्षित भविष्य देखकर प्रभावित हो रहे हैं।
वरूण कह रहे हैं सीडी से छेड़छाड़ की गई है। न तो आवाज उनकी है और न ही शब्द। जनाब गांधी जी आपको लगता है कि आपकी राजनीति इतनी प्रबल है कि कोई पार्टी आपसे भयभीत होकर आपकी धूमिल छवि बिगाड़ना चाहेगी। अगर ऐसा ही है तो आपकी पार्टी में आडवाणी, वाजपेयी सरीखे अन्य बड़े नेताओं की सीडी बनाकर खबरिया चैनल को कब की बेच दी जाती। या फिर आप अपने पिता के नक्शे कदम पर चलने की सोच रहे हैं। तानाशाही और भड़काउ प्रवृत्ति से प्रेरित।
खैर यहां मैं धर्मनिरपेक्ष औैर लोकतंत्र भारत की दुहाई नहीं दूंगा। क्योंकि यह तो कब के अपंग और विवश हो चुके हैं। लेकिन पीलीभीत के अधिकारी जरूर इस राजनीतिक लोलूपता में पिस गए। साथ ही इस बयान बखेड़ेबाजी से वरूण का फायदा ही हुआ है। वह जो चाहते थे उन्होंने पा लिया। चुनाव से पहले चर्चित चेहरा बनना। साथ ही मीडिया कवरेज न पाने का डिप्रेशन भी दूर हो गया होगा। सस्ती लोकप्रियता का इससे अच्छा रास्ता शायद ही उन्हें मिल पाता। खैर भाजपा ने दिखावे के लिए किनारा कर तो लिया पर आप चुनाव जीतोे सब ठीक हो जाएगा। वरूण तुम सही हो भाजपा के नक्शेकदम पर ही चल रहे हैं पार्टी में आगे बढ़ोगे।
पर अफसोस इस तरह के बयान देकर लोकप्रियता पाने वाले कथित नेता भूल जाते हैं कि भारत वही देश है जिसके निवासियों ने एक होकर 1857 में अंग्रेजों के हौंसले तोड़ दिए थे। यह वह देश है जब गांधी के नेतृत्व में हिंदू और मुसलिम साथ साथ लाठियां खाते थे। लेकिन यह उन लोगों का देश भी है जो अब तक इंसान नहीं बन पाएं हैं..... आपको किस खेमे में रहना है आप तय करें......? हमारी बला से
राहुल कुमार

रविवार, 8 मार्च 2009

मैं स्लम डॉग बोल रहा हूं

जानता हूं बहुत देर बाद बोल रहा हूं। पर बोल रहा हूं। क्योंकि विदेशी ही नहीं अपनों ने भी यह हालात पैदा कर दिए हैं कि मुझे बोलना पड़ रहा है। बहुत को बुरा लगेगा, मेरा बोलना नहीं सुहायेगा, पर मेरी बला से लगता रहे। मैं बोलने को लालायित हो उठा हूं। खासकर तब से जबसे बड़े पत्रकार और संपादकों को खुद पर टिप्पणी करते देख रहा हूं। विदेशियों ने मुझे ऑस्कर के बहाने भरे चौराहे नंगा दिखाया मैं नहीं बोला। मेरे नाम पर कुछ भारतीयों को ऑस्कर दिलवाया और मेरी फ्रिक का झूठा संदेश देना चाहा, मैं नहीं बोला। मैं तब भी नहीं बोला जब मुझे एक महानायक का इतना दीवाना बता दिया कि मल की गंदगी में कुदा दिया, खास कर तब भी नहीं जब नायिका को रिंगा रिंगा पर वैश्यालय में ठुमके लगाते दिखा दिया गया। क्योंकि यह कहीं न कहीं सच हैं। और इसलिए भी नहीं बोला कि मैं विदेशियों से क्या बोलू। जब सदियों से घृणा और तिरस्कार अपने ही देशवासियों से सहता रहा तो विदेशियों से कैसे उम्मीद रखूं कि वह मेरे लिए अच्छा सोचेंगे। उन्होंने भी मेरी नंगई दुनिया को दिखाई और खूब नाम कमाया।
मैं इसलिए बोलने को तड़प उठा हूं जब देश का चैथा स्तंभ संपादकीय लिख रहा हैं कि विदेशियों ने हमारी गरीबी को कैद कर नाम कमाया है। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि उसे ऑस्कर दिए जाएं। ऑस्कर का यह सम्मान भारत की हथियारों से सशक्त और आर्थिक रूप से सुदृढ़ छवि को मिटाने की एक योजना भर है। विदेशी आज भी यह जताना चाहते हैं कि भारत आज भी भूखों नंगों का देश है।
मैं तब बोलने के लिए उत्सुक हुआ हूं जब कहा जा रहा है कि फिल्म को ऑस्कर मिला पर स्लम में रहने वालों का क्या हुआ, उन्हें क्या मिला....? वह स्लम डॉग तो आज भी वैसे ही हैं जैसे थे। सच है और उम्दा सच है। क्योंकि मेरी नियति ही यह है। मुझे कोई दुख नहीं विदेशियों ने मेरी इज्जत से खेला और वैष्विक स्तर पर नंगा कर दिया। लेकिन मैं आहत उन अपनों से जो यह कह रहे हैं कि मुझे क्या मिला। मैं पूछना चाहता हूँ उन बड़े लेखको से कि मैं तो सदियों से तुम्हारा हूं। तुमने क्या दिया....? जब से मानव सभ्यता बनी तभी से घृणित और तिरस्कारित हूं। मैंने वो दौर भी झेला है। जब मेरी परछाई से भी सभ्य अपवित्र हो जाते थे। मुझे चप्पल पहनने की इजाजत न थी। मैं शमशान में रहता था और दिन उगने से पहले या दिन डूबने के बाद भोजन के लिए निकलता था। ताकी परछाई किसी पर न पड़ जाए। भोजन के लिए उन बंद दरवाजों की दहलीज से जूठन उठा उठाकर खाता था जो मेरा चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते थे। इसलिए दहरी पर जूठन रखकर दरवाजे बंद कर लेते थे और मुझे हाथ में थमाई थाली बजाकर गांव में प्रवेश करना पड़ता था ताकी सब छुप जाए। मेरा मनहूस चेहरा कोई देख न पाए। सब जान जाए मैं यानी अछूत यानी स्लमडाॅग आ रहा हूं।
मैं बताना चाहता हूं यह वही देश हैं जहां धर्म के कुछ चंद ठेकेदार मंदिरों में भी मुझे नहीं जाने देते। दबंगों और बाहुबलियों की हवस का शीकार मैं कई बार हुआ हूं। घर की लड़कियां बेची गई और इसी देश में ही खरीदी गईं। हां मैं इसी देश का स्लम हूं जहां जन्म लेने वाली लड़कियों का भविष्य या तो दबंगों को खुश करने में है वेश्यालय में। हां, मैं वही दूर दराज का स्लम हूं जिसकी लड़की और उसकी मां के साथ महज इसलिए रेप किया जाता है कि वह आठवीं कक्षा में सारे गांव में अव्वल आई है। जी हां, मैं वही स्लम हंू जिसपर गंदी राजनीति होती है। जिससे वोट बैंक बनाया जाता है। जिसे हर कोई दबाना या खरीदना चाहता। वहीं स्लम जिस पर लिख लिख कर कई कथित विद्धान खुद को दलित साहित्यकार बताते हैं। और उंचे ओहदे पर जम गए हैं तरह तरह के वादी वाले साहित्यिक संघ बना डाले हैं।
फिर कैसे आप सब लोग विदेशियों से यह कह सकते हैं कि उनने ऑस्कर जीत लिया पर मुझे क्या मिला। जाहिलों जब तुम और तुम्हारा देश इतने सालों में मुझे कुछ न दे सका तो विदेशी एक फिल्म का मुझे क्या देंगे। तुम्हारे साहित्यकार, राजनेता, हवस की प्रेमी सब ने मुझे प्रयोग किया पर किसने क्या दिया....? तो विदेशियों से आश लगाना तुम्हारी लोलुपता ही है।
सबसे ज्यादा आहत तब हूं जब पत्रकारों और संपादकों को लिखते देख रहा हंू कि स्लम डॉग को क्या मिला। यह साजिश है। भारत के खिलाफ। हंसता हंू खुद की स्थिति को देखकर जब उन पत्रकारों और संपादकों को लिखते देख रहा हूं जिसके अखबार में सख्त आदेश हैं कि 15000 से कम आय वाले व्यक्ति की कोई खबर नहीं छपेगी। अखबार का टारगेट इससे ज्यादा मासिक आय पाने वाले व्यक्ति हैं। संवाददाताओं की स्लम पर लिखी खबरों को कचरें से डब्बे में फेंक देने वाले उन संपादकों को लिखते देखता हूं तो महज अखबार का एक काॅलम और खुद की खेलनी चमकाना चाहते हैं और पूछतें हैं मुझे क्या मिला..........?

राहुल कूमार

बुधवार, 4 मार्च 2009

विश्वास गहराता जाता है

जाने क्यूं जब जब भी रिश्तों को टूटते देखता हूं तो उन पर और भी गहरा विश्वास होता है। सोचता हूं मैं अपने जीवन में किसी भी रिश्ते को टूटने नहीं दूंगा। इसके लिए मुझे कितना भी असह दर्द क्यों न सहना पड़े। टूटते रिश्तों को महसूस करने के बाद जाने क्यों उन्हें निभाने की अजीब सी जुस्तजू खुद व खुद जाग जाती है। दूसरे ही पल हर कीमत पर रिश्तों को निभाने के लिए तत्पर हो उठता हूं। क्योंकि बगैर रिश्तों के जीवन में कोई रंग है ही नहीं। वह लोग जो अकेले जीते हैं कितने बेबस और प्यार के बिना होते हैं। बगैर सच्चे दोस्त, मां, पिता, भाई, बहन, प्रेमिका, और भी न जाने कितने प्यारे रिश्तों से परे। खूब खुशियाँ देने वाले रिश्ते। जहां अपनापन और अस्त्तिव का अहसास मिलता है। जहां एक ऐसी बेफ्रिकी मिलती है कि सारे डर खत्म हो जाते हैं। छल, कपट, धोखा, और ओझेपन नाम की कोई चीज दरमियां नहीं होती। प्यार भरा घना साया मिलता है इन रिश्तों की छांव में। जहां मां का खुद भूखा रहकर बच्चों को खाना खिलाने का त्याग है, पिता का सालों थिगरी लगी कमीज पहने रहकर बच्चों को हर जन्मदिन पर नई पोशाक दिलाने की चाह है, जहां छोटे भाई की खुशी के लिए बड़ा भाई जानबूझकर खेल में हार जाता है और हार में जीत का आनंद लेता है। इतना प्यार की बहिन छोटे भाई को कभी कपड़े नहीं धोने देती। दोस्त, दोस्त के लिए जीवन न्यौछावर कर देता है। प्रेमिका का ऐसा साथी जिसकी याद आने भर से दुनिया भर की बालाएं टल जाती हैं। कितनी प्यारी और गहरी है ये रिश्तों की दुनिया।

सच कहूं तो वहीं लोग रिश्तों को निर्दयता से तोड़ते हैं जिन्हें रिश्तों की समझ नहीं होती और उनसे मिलने वाले प्यार के अहसास को वह अनुभव नहीं कर पाते। वरना इन गहराईयों को कौन ठेस पहुंचाना चाहेगा। इसके पीछे अकसर एक तर्क ढूंढता रहा हूं कि ऐसे क्या कारण होते हैं कि जिन्हें छोड़ देने के बजाये लोग रिश्ता तोड़ लेते हैं। साथ ही ऐसा क्यों होता कि रिष्ता तोड़ने के कारण पनप आए। खासकर जो आपका है और आपके दुख से आहत हो जाता हो। उससे।

जब जब भी मनु भंडारी का उपन्यास आपका बंटी पढ़ता हूं तो रिश्ता तोड़ने से डरता हूं। डरता हूं जब लोगों को तड़पते और पश्चाताप करते देखता हूं। खूब देखा है मैंने। पर फिर भी तोड़ देते हैं लोग रिश्ता तोड़ देतें हैं। जब देखता हूं भारत और पाकिस्तान की बाड़ में परिवारों के बंटने का दर्द और कभी न मिल पाने की बेबसी। जब लोगों का पलायन करने की मजबूरी और जेहन में हर वक्त कौंदते रहने वाली टीस महसूस करता हूं, तो रिश्ता तोड़ने से डरता हूं। अपनी जमीन से, अपने गांव से, अपने कस्बे से बिछुड़ने चुभन रह रह कर पाता हूं। जहां बचपन बढ़ा हुआ। जहां पहला प्यार मिला। जहां की नीम व बरगद की छांव आज भी बुलाती है। उन पहाड़ों की पुकार जिन पर बैठ कर कई दोपहर सांझ में ढाल दी थी और घंटों अपने गांव को निहारा था। गांव की वह पथरीली और कांटे भरी पगडंडियां जहां नंगे पैर चलने का अपना ही आनंद था। सभी रिश्तों को महसूस करता हूं तो डर जाता हूं रिश्ता तोड़ने से।

परिवार वाले हो या यार दोस्त सभी के चेहरे देखकर रिश्ता निभाने की कसम खाता हूं। फिर कहां मिलना जिंदगी में इन लोगों को। अच्छा है कि जिनकी याद में कल तड़पना पड़े उन्हें आज ही जाने से रोक लिया जाए। वरना समय फिर नहीं लौटना और न ही वह साथी जिसे खो दिया है।
राहुल कुमार

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

पागल पागल रहतें हैं

जब मुझे प्यार नही था तो सोचता था कि जिस दिन प्यार करूँगा तो टूटकर करूँगा। सारी दुनिया भुला बैठूँगा। दोनों हाथ खोलकर खुशी से सारे आकाश को दौड़कर बांहों में भर लूँगा। खिली खिली फिजाये सिर्फ़ मेरी होंगी। फूल मेरे लिए खिलेंगे, बसंत मेरे लिए गाएगी और पतझड़ की उदासी मुझे छो तक नही पाएगी, बूँदें मेरे लिए बरसेंगी, सुबह मेरी होगी, शाम मेरी। सर्दी के गुलाबी दिन और गर्मियों की चांदनी रातें सिर्फ़ मेरे लिए महकेंगी।
मैं ऐसे प्यार करूँगा कि हर पल खुशियों से लबालब हो जाएगा। वो चाहे न चाहे पर मैं तो वेपनाह प्यार करूँगा उसे। ऐसे कि धर्मवीर भारती की उपन्यास गुनाहों का देवता का प्यार भी बहुत पीछे छूट जाएगा। उपन्यास की नायिका सुधा भी मुझ सा प्यार करने को लालायित हो उठेगी। उसकी हसी पर सारा जहा न्योछावर कर दूंगा। उसे इक पल दूर नही होने दूंगा। अपने रिश्ते को ऐसी गहराईयों तक ले जाऊंगा जहा से जुदाई की सारी लकीरें ख़ुद व ख़ुद मिट जाती हैं। प्यार की ऐसी गर्माहट दूंगा कि जीवन में कुछ और पाने की लालसा नही रह जायेगी। मेरे दिन जीवन के सबसे खूबसूरत और अनमोल लम्हे बन जायेंगे। जो भुलाये नही भूलेंगें।
उसका हाथ अपने हाथो में लेकर घंटों यूँ ही देखता रहूँगा। वो होगी तो जिन्दगी होगी। कोई गम मुझे छू तक नही पायेगा। पहले जानबूझकर उसे नाराज कर दूंगा फ़िर सर झुकाकर माना लूँगा। उसे।
ऐसा प्यार जहा एक-दूसरे के बिन जीना मुश्किल होगा। एक दिन बात न होने पर पहाड़ सा टूट पड़ेगा। जहा धडकनों को धडकनों के धड़कने से महसूस किया जाता हो। जहा मिलने की उत्सुकता हो, जहा एक दूसरे के लिए बेचैनी हो, जहा आतुरता हो, बेताबी हो, महज दिल बात करता हो दिमाग जैसी कोई चीज दरमियाँ न हो, जहा पागलपन हो, व्याकुलता हो, एक-दूजे से मिलने के लिए जहा छटपटाहट हो, रातों को अचानक उठ कर बैठ जाते हो जब नीद टूट जाती है,
पर आज जाने क्यो उसके होते हुए भी तनहा हूँ। सोचता हूँ कितनी अजीब होती हैं ये ख्यालों की बातें,,,,,,,, ?

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

तुम्हारी याद

तुम्हारी याद में चहका, तुम्हारी याद में महका
तुम्हारी याद में निखरा, तुम्हारी याद में बिखरा
तुम्हारी याद मुझको रात भर सोने नहीं देती,
कभी हंसने नहीं देती, कभी रोने नहीं देती।

तुम्हारी याद मेरे घर के चौकीदार जैसी है ,
जो पूरी रात जगती है, सुबह करवट बदलती है।
तुम्हारी याद दादी माँ की उस लोरी सरीखी है,
कि जो बच्चों की मीठी नींद में अक्सर टहलती है।
तुम्हारी याद घर आई हुई चिट्ठी की तरह है,
जो अपने दूर के संदेश भी नजदीक लाती है।
तुम्हारी याद पूजाघर में प्रातः वंदना जैसी
जिसे हर रोज़ मेरी माँ बड़ी श्रद्धा से गाती है।
तुम्हारी याद मुझको भीड़ में खोने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।
तुम्हारी याद मेरे सोच की गहराइयों में है
तुम्हारी याद मेरी रूह की परछाइयों में है।
तुम्हारी याद मेरी चेतना के पंख जैसी है
तुम्हारी याद सन्नाटे में गूंजे शंख जैसी है।
तुम्हारी याद मरुथल में भटकती प्यास भी तो है
तुम्हारी याद सीता का कठिन वनवास भी तो है।
तुम्हारी याद जीने का सबक देती तो है, लेकिन
तुम्हारी याद मरने तक कोई संन्यास भी तो है।
तुम्हारी याद क्यों मुझको, मुझे होने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।

तुम्हारी याद फूलों सी, तुम्हारी याद शबनम सी,
हवा के मंद झौकों सी, नए मदमस्त मौसम सी।
तुम्हारी याद झूलों सी, तुम्हारी याद सावन सी,
तुम्हारी याद अंगडाई, तुम्हारी याद धड़कन सी।
तुम्हारी याद राधा-कृष्ण में व्याकुल सी मीरा सी,
तुम्हारी याद तुलसी, सूर, रत्नाकर, कबीरा सी।
तुम्हारी याद जयशंकर, महादेवी, निराला सी,
तुम्हारी याद बच्चन की छलकती मस्त हाला सी।
सुमन जैसी तुम्हारी याद, दिनकर सी, भवानी सी,
तुम्हारी याद कोमल गीत, चौपाई, कहानी सी।
तुम्हारी याद समझौता कोई ढोने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

खुदा का शुक्र है मैं मुसलमान नही

ये मेरे साथ पहली बार नही हुआ है। करियर बनाने ही धुन के संघर्षमय दौर में ये चोथी बार हुआ है। और सोचता हूँ कि क्या भारत में मुसलमान होना इतना बड़ा जुर्म है ? जिसे ख़ुद एक मुसलमान भाई भी नही जानता होगा। खुदा की मर्जी से इंसान जन्म लेता है और जिन्दगी की गुजर बसर करता है। इस दुनिया में जन्म लेने से पहले अगर इश्वर पूछता कि अमुख व्यक्ति कंहा जन्म लेना चाहता है तो शायद ही कोई भारत में मुसलमान और पकिस्तान में हिंदू बनकर जन्म लेने की हामी भरता ?
मैंने अपना देश देखा है इसलिए अपनी बात करता हूँ। पिछले कुछ दिनों से एक कमरे कि तलाश में घूम रहा हूँ। ठीक वैसे ही जब पहली बार कुछ कर गुजरने की चाहत लिए दिल्ली की गलियों की ओर गाँव से कसबे, कसबे से ग्वालियर जैसे महानगर और ग्वालियर से राजधानी दिल्ली की ओर कूच कर बैठा। तब पहली बार जाना था कि अगेर मैं मुसलमान होता तो कितनी मुश्किलें ख़ुद व ख़ुद घेर लेती। कमरे को किराए पर देनी की पहली शर्त मुसलमान न होना थी। यही शब्द फ़िर मेरे कानो में हाल ही में गूंजे हैं जो चोथी बार है।
बात उन दिनों की है जब जनसत्ता अखबार में इन्टर्न शिप करने के लिए पहली बार मैं दिल्ली आया था। दो माह की इंटर्नशिप थी। इसकारण रहने और खाने पीने का आस्थाई इंतजाम करना जरूरी था। काफी पूछ ताछ के बाद पता चला की सस्ता और सुलभ कमरा न्यू अशोक नगर में मिल सकेगा। सो तलाश जारी कर दी। जितने मकान मालिको से बात हुयी सबका पहला सवाल था मुस्लमान तो नही हो ? मैं अचरज में पड़ गया था, यह सोच कर की गर मैं मुसलमान होता तो क्या वाकई मुझे कमरा नही मिलता ? शुक्र है खुदा का मैं मुसलमान नही हूँ। फ़िर चाहे हिंदू होकर ही कितना भी कमीना, मदिरा पान करने वाला, मांस खाने वाला व अयियास क्यों न होऊ। कोई फर्क नही पड़ता। यहाँ तो हिंदू और मुसलमान जैसे शब्दों पर ही सारे समीकरण अटक जाते हैं। एक दूसरे से नफरत का कारन हिंदू और मुसलमान होना काफी है। हाल ही में फ़िर से कमरे की तलाश में घूम रहा हूँ। खूब भटका हूँ पर पहले वाला सवाल आज भी पहले पायदान पर ही हैं,, सच मैं मुसलमान नही हूँ, और होऊ भी तो क्या इस तरह के माहौल में कोई अपने धर्म को बताएगा ? न भी बताएगा तब भी कहा छोड़ा जाता है दंगो में। गाँव और मुहल्ले धर्म के नाम पर जला दिए जाते हैं। महिलायों की इज्जत महज इसलिए लूट ली जाती है क्योकि वह दूसरे धर्म की होती हैं। क्या किसी की सामाजिक जिन्दगी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर देनी चाहिए की वह दूसरे धर्म की हैं ? आहत हूँ ये सोचकर, इसतरह का व्यवहार करने के बावजूद हम उम्मीद करते हैं की अमुख धर्म के लोग इक होकर रहे, देश का सम्मान करे ?
भीष्म साहनी की उपन्यास तमस की गन्दी राजनीति याद आती हैं जिसमे मुस्लिम नेता हिंदू के हाथो सूअर मरवा कर मस्जिद में डलवा देता है। फ़िर दंगे होते हैं, हर धर्म का जिहादी काफिला अपनी मर्दानिगी के किस्से सुनाते हैं की किस गाँव में कितनी महिलायों और लड़कियों के साथ बलात्कार किय है, वह किस्सा आज भी नही भुला पाता हूँ जब रातों को दंगा कर के टोली लौटती है और इक बहादुर किस्सा सुनाता है - अरे उस महिला को देखा था कैसे हम लोगो को देखकर हाथ जोड़कर चिला उठी थी की मेरे साथ कुछ भी कर लो पर मुझे छोड़ दो। फ़िर भी हम माने नही थे, पूरा सबक सिखाया था। तभी एक और बहादुर कह उठता है अरे जब तक मेरी बारी आई साली मर ही गई थी।
सब कुछ जानते हुए भी हम आज भी वैसे ही है जैसे पहले थे। भाजपा मदिर के नाम पर वोट मांग रही है। मोदी मुख्यामंत्री बन जाता है ? धर्म के नाम पर नफरत के नाम पर.... फ़िर भी हम प्यार तलाशते फ़िर रहे है ? अमन से रहने की बात करते फ़िर रहे हैं ? फ़िर कल ही मन्दिर मस्जिद की दीवार हिलेगी और लाशो के ढेर लग जायेंगे। और तस्लीमा नसरीन की उपन्यास लज्जा का नायक दस रुपए देकर भी जबरदस्ती करेगा क्योकि वह मुसलमान की लड़की है ........

राहुल कुमार

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

ग़ज़ल

अक्सर तेरे ख्याल से बाहर नहीं हुआ
शायद यही सबब था मैं पत्थर नहीं हुआ।

महका चमन था, पेड़ थे, कलियाँ थे, फूल थे,
तुम थे नहीं तो पूरा भी मंज़र नहीं हुआ।

माना मेरा वजूद नदी के समान है,
लेकिन नदी बगैर समंदर नहीं हुआ।

जिस दिन से उसे दिल से भुलाने की ठान ली,
उस दिन से कोई काम भी बेहतर नहीं हुआ।

साए मैं किसी और के इतना भी न रहो,
अंकुर कोई बरगद के बराबर नहीं हुआ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

कोई बतलाये कहा जा के नहाया जाए


आग बहती हैं यहाँ गंगा में और झेलम में भी, कोई बतलाये कहा जाके नहाया जाए, अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए, विश्व विख्यात कवि पदमश्री गोपालदास नीरज ने जब ये पंक्तिया मंच से सुनाई तो सारा परिसर में तालियों से गूँज उठा। मौका था २६ जनवरी पर आयोजित कवि सम्मेलन का, जिसमे जाने माने कवियों ने हिस्सा लिया और शाम को यादगार बना दिया।सम्मेलन में लंबे अरसे बाद फिल्मी दुनिया के सफल गीतकार नीरज को मंच का संचालन करते देखा गया। नीरज ने अपनी सुविख्यात पन्तिया गीत खामोश है गजल चुप है रुबाई है दुखी इसे मौसम में नीरज को बुलाया जाए सुनाई। साथ ही मैं चलता हूँ चलता हूँ अभी चलता हूँ, गीत दो प्यार के झूम के गा लूँ तो चलूँ भी गुनगूनायी। सम्मेलन की शुरुआत आगरा से आई लोकप्रिय कवियत्री चेतना शर्मा ने सरस्वती वंदना से की। इसके बाद उन्होंने सिंगार की कविता पढ़ी बोले थे- जब टूटता कोई दिल आवाज नही होती। टूटे हुए पारो से परवाज नही होती। चाहत का मकबरा न ये ताजमहल होता। दुनिया में हर हसीना मुमताज नही होती।वीर रस के जाने माने कवि राजवीर सिंह क्रांतिकारी ने अपने ओज के अंदाज में कविता पढ़ी- जब तलक पीते रहे तुम खून हम खामोश थे। मेरठ से आए पुअपुलर मेरठी ने हास्य रस की कविता पढ़ लोगो को गुदगुदाया- याद आने लगे चाचा ग़ालिब भाई माजरा क्या है ताड़ता हूँ हरेक लड़की को वरना आँखों का फायदा क्या है आगरा से आए युवा कवि शशांक पभाकर ने देश की साम्प्रदायिकता पर व्यंग किया।

आज फ़िर आदमी नंगा हो गया गया है ।

दोस्त मेरे शहर में दंगा हो गया है ॥

बुलड़शाहर से आए ओज के कवि अर्जुन सिसोदिया ने वीर रस की कविता पढ़ी

दिल्ली दस घंटे की इजाजत हमे जो देदे

इंच इंच पाक में तिरंगा गाढ आयेंगे।

युवा कवि चेतन आनंद ने भी कविता पढ़ी। बोले थे -

न आंसू की कमी होगी

न आँहों की कमी होगी

कमी होगी तो बस तेरी निगाहों की कमी होगी

की मेरे कत्ल का चर्चा

अदालत में न ले जाना

तुझे ख़ुद को बचाने में

गवाहों की कमी होगी

राहुल कुमार

रविवार, 18 जनवरी 2009

विश्वविद्यालय- चेहरे बदल गए सपने वही हैं

बहुत दिनों बाद पूरे मन से अपने विश्वविद्यालय गया। उसे जीने के लिए। फ़िरसे महसूस करने के लिए। जेहन में उठ रही बहुत सी यादो को फ़िर से एक आकार देने के लिए। अपने विश्वविद्यालय में। जिसने बहुत प्यार दिया। बहुत से प्यारे और अपनों से मिलाया। जिसने जीने की नई राह दिखाई। जिसने रुलाया, हसाया, बहुत से खट्टे मीठे अनुभव दिए। जहा मेरा सबसे ख़ास समय बीता। जहा आशीष सर मिले। मुझे बहुत प्यार करने वाले। ऐसे गुरु जो दोस्त ज्यादा है। जिन्होंने जोश दिया। अरमानो को पूरा करने का। तोमर सर मिले जिन्होंने समाज को देखने की इक नई द्रष्टि दी। जहा उत्सव मनाया। जहा उत्साह को जिया। जहा उमंग भरी सुबह और महनत से थका देने वाली शाम बितायी। मेरा विश्वविद्यालय। जो अभी भी रातों को जगा देता है। जिसकी याद दिन को उदास कर जाती है। जो मेरा था। शायद है ? जिसे जीने की चाहत आज भी है। उन्ही अपनों के साथ जो अपने थे।
गाड़ी न होने की वजह से पहले की तरह पैदल विश्वविद्यालय गया। मन पुरानी यादो से सराबोर था। वही अशोका मार्ग और वही मोल श्री पथ बिल्कुल वैसे ही मुझ देख रहे थे जेसे पहले हमेशा देखा करते थे। मुझ आते जाते हुए। जिनसे अक्सर अकेलेपन में मैं बात कर लिया करता था। सुख की दुःख की। अपनेपन की। विश्वविद्यालय जनवरी की गुलाबी सर्दी में बेहद खूबसूरत लग रहा था। हमारे विभाग के सामने का पार्क और भी सुंदर हो गया है। पूल में पानी भर दिया गया है जो हमेशा खाली रहता था। पार्क में हमेशा की तरह लड़के लकडिया साथ साथ पढाई कर रहे है। कुछ पढाई कुछ, कुछ कुछ करने की कवायद। प्यार और विश्वविद्यालय की यादो को अमर बनाने की कवायद। जो याद आए तो खुशी का एक झोके की तरह हो।
येही पार्क जहा हमने भी पढाई की थी। क्लास के अभाव में। जहा बीज बोए थे आंदोलन करने के। जहा तय हुयी की कहानी नई लहर की। इसी पार्क में बैठे बैठे सोच था। क्लास और हक़ के लिए लड़ के रहेंगे। और लड़ भी।
विभाग में पहुचा तो सबसे पहले अपनी क्लास को निहारा। देखा। किनता समय बदल गया। कल तक इन कुर्सियों पर हम बैठा करते थे। पहले दुबेदी सर फ़िर तोमर सर से पड़ते थे। खूब मजे के साथ। हसते। फटकार खाते। अचानक मेरी निगाह क्लास की दीवारों गई। बदलाओ था। पर अच्छा था। अब दीवारों पर विभिन्न समाचारों का मुख्या प्रष्ट लगा दिया गया है। जहा मैंने उत्साह में भगत, सुभाष, और विवेकानंद की तस्वीरें लगा दी थी। तोमर सर ने ठीक नही समझा था। क्लास में ये सब नही। सिर्फ़ पढाई। बाद में भुवनेश सर से मिलना हो गया। हाल चाल पूछे। कुछ चर्चा हुयी। मीडिया पर। उसकी स्तिथि पर।
मुझसे मिलने मेरे कुछ नए साथी आए गए। उन्हें पता चल गया था की मैं विश्वविद्यालय आ रहा हूँ। असल में मैं भी उनसे मिलना चाहता था। विश्वविद्यालय की पिछले दिनों से जाने क्यो बहुत याद कर रहा था मैं। सो उसे जीने के लिए फ़िर से विश्वविद्यालय आ ही पहुँचा। हरीकृष्ण, दीपाली, निहारिका, और सीनू मिलने आ गए। इनकी आखो में ठीक वैसे ही सपने जेसे हमारे थे। यह भी उन्ही बातो को लेकर उतावले और सहमे हैं जिनके लिए हम थे। और आज भी है।
वाकई विश्वविद्यालय अभी भी वही का वही है। बस चेहरे बदल गए है। सपने वही है। शायद इसलिए विश्वविद्यालय हमेशा जिन्दा रहता है। यहाँ सपने पलते हैं। हर साल नए चेहरों के साथ। नया उत्साह। नई सोच । और नई शक्ति लिए नए लोगो के मन में। कुछ कर गुजरने के, कुछ बनने के। कल ये भी पुराने हों जायेंगे। जिन्दगी चलती रहेगी। याद आती रहेगी। अपनों की। अपनों के साथ बिताये प्यारे लम्हों की। जो जेहन मैं हमेशा कुलबुलाते रहेंगे। जो रह रह कर याद आते रहेंगे। जो बहुत रुलायेंगे, फ़िर याद आयेंगे। उतना ही ज्यादा जितना जीवन को महसूस करेंगे। कल तक हम भी वही थे। जी रहे थे। पर अब सिर्फ़ यादे है। खट्टे मीठे लम्हे। मेरे दोस्तों तुम्हे भी याद आएगी। तुम भी जेहन में छुपी इन यादो को महसूस करके रोओगे, हसोगे, अभी जी लो । फ़िर नई दुनिया तुम्हारा इन्तजार कर रही है। जहा तुम्हे अपने सपनो को सच करना है, नए आयाम स्थापित करना है। अपनों के साथ जियो । अपनों को लेकर जियो। क्योकि कल इनके साथ रहने को नही मिलना है, रास्ते बदल जायेंगे। सिर्फ़ यादें रह जाएँगी। कुछ ऐसे ही सपने हर किसी के मन में। हर साल रहते हैं। कुछ विश्वविद्यालय के अंदर के सपने। तो कुछ बाहर के छात्रो की कसक के रूप में। पर नही रुकता विश्वविद्यालय का फलसफा। जो बहुत कुछ सिखाता है। फ़िर याद बन जाता है, हमेशा के लिए। वाकई मैंने तुम्हे बहुत याद करता हूँ मेरे विश्वविद्यालय
राहुल कुमार